क्यों हुआ बिहार ग्लोबल सम्मेलन?

 मंगलवार, 21 फ़रवरी, 2012 को 02:36 IST तक के समाचार
बिहार ग्लोबल सम्मेलन

पटना में हाल ही सम्पन्न हुए तीन दिनों के 'ग्लोबल बिहार सम्मलेन' का बौद्धिक मंथन राज्य का नहीं, राज्य सरकार का मददगार बना.

देश-विदेश की कई जानीमानी हस्तियों ने लम्बे-लम्बे भाषण दिये और उनकी छोटी-छोटी गोष्ठियां भी ख़ूब जमीं.

शहर के सबसे महंगे होटल में मज़ेदार ब्रेकफ़ास्ट, लंच और डीनर का कचरम-कूट मचा और सरकारी मुखिया के आवास पर भी महाभोज हुआ.

संक्षेप में जान लीजिये कि मेहमानों के विमान किराये से लेकर होटल में शाही स्वागत-सत्कार तक करोड़ों रूपए ख़र्च हुए. और यह ख़र्च उठाया इस ग़रीब राज्य की ' अमीर ' सरकार ने.

इस पूरे आयोजन के पीछे जो असली मक्सद छिपा था,वह पूरा हुआ. यानी 'सुशासन' की तारीफ़ में तालियाँ ख़ूब बजीं.

भरपूर सरकारी विज्ञापनों से गदगद अख़बारों ने स्वागत में सुर्ख़ियों की सेज बिछा दी. सम्मलेन का निष्कर्ष राज्य-हित में कोई रास्ता सुझाएगा, ऐसी उम्मीद थी भी नहीं.

इसलिए दूर से इस राजसी समागम को देख रहे आम लोगों ने समझ लिया कि 'ग्लोबल छवि' बनाने का यह कॉरपोरेटी स्टाइल है.

एक बार फिर साबित हुआ कि मुख्यमंत्री की 'असीम अनुकम्पा' से राज्य सभा के सदस्य बने एक बहुचर्चित बाबू साहब को इस तरह के काम में महारत हासिल है.

इस पूरे सरकारी कर्मकांड पर सबसे शालीन प्रतिक्रिया यही हो सकती है कि आयोजन जितना बड़ा था, प्रयोजन उतना ही छोटा नज़र आया. नाम बड़े और दर्शन थोड़े.

नया क्या?

इसमें बतौर वक्ता भाग लेने वालों की सूची में कुछ चमकते नामों पर नज़र डालिए.

नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई, महात्मा गाँधी के पौत्र और पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गाँधी, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव और पूर्व गवर्नर वाई.वी. रेड्डी, लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स के विख्यात अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर लॉर्ड निकोलस स्टर्न और लॉर्ड मेघनाद देसाई, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया, इसी आयोग के सदस्य प्रोफ़ेसर अभिजीत सेन, आदित्य बिड़ला समूह के अध्यक्ष कुमारमंगलम बिड़ला, पूर्व केन्द्रीय मंत्री वाई.के. अलग, आईसीआईसीआई बैंक और इनफ़ोसिस के चेयरमेन के.वी.कामत, गीतकार जावेद अख्तर और पत्रकार एमजे अकबर समेत कई अन्य बहुचर्चित लोग इसमें शरीक हुए.

ग्लोबल बिहार सम्मेलन

इस सम्मेलन में दुनिया भर से कई बड़े अतिथि बुलाए गए थे

अब ज़रा सोच कर देखिए कि इन तमाम हस्तियों ने ऐसा क्या ख़ास कहा होगा, जो बिहार की दशा-दिशा सुधारने के संदर्भ में अबतक नहीं कहा गया हो?

राज्य की क़ानून-व्यवस्था ठीक रहे, यहाँ बिजली की वर्तमान दुर्दशा में सुधार हो, सड़कें और बनें, अच्छी बनें, प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर तक शिक्षा और स्वास्थ्य की सेवाएं दुरुस्त हों, कृषि क्षेत्र के विकास पर ज्यादा ज़ोर दें और राज्य में उद्योग-धंधा बढाने का माहौल बने.

सुझाव तो मोटे तौर पर सीधे-सादे शब्दों में बस इतने ही हो सकते हैं. भले ही इन्हें आंकड़ों और तकनीकी शब्दावलियों से भारी बना कर पेश किया जाए.

लेकिन क्या फ़ायदा, जब नीतीश सरकार पहले से ही सीना ठोंक कर कह रही है कि यह सारा काम छह वर्षों से हो रहा है और इसीलिये बिहार तेज़ी से बदल रहा है.

कमाल देखिये कि यह सरकार बिजली या उद्योग संबंधी अपनी जग ज़ाहिर विफलताओं को भी केंद्र सरकार के मत्थे डाल कर गाल बजाती रही.

ये अलग बात है कि बिहार हमेशा केंद्र की उपेक्षा का दंश झेलता रहा है. ख़ासकर इस राज्य में केंद्रीय निवेश को लेकर बरती गई कोताही के क़िस्से काफ़ी चर्चित रहे हैं.

बैंक ऋण के मामले में यह राज्य साख-जमा अनुपात सबसे कम होने का रोना आज तक रो रहा है. लेकिन सच ये भी है कि बिहार के राजनीतिक नेतृत्व की कमज़ोरी ने ये हकमारी होने दी.

मौजूदा सरकार ने भी 'ग्रोथ रेट' वाले छद्म विकास का तो भ्रमजाल ही बुना है. इसलिए मीडिया-प्रचारित जानकारी के बूते नीतीश राज के प्रशंसक बने बाहरी लोग ज़मीनी सचाई देख-समझ नहीं पा रहे.

विकास की जीत?

उनके पास लालू राज से नीतीश राज की तुलना वाला सबसे आसान तर्क है.

लालू प्रसाद यादव

बिहार की मौजूदा समस्याओं के लिए लालू प्रसाद यादव की पूर्ववर्ती सरकार को दोष दिया जाता रहा है

उन्हें तो ये भी नहीं मालूम कि बिहार के जिस नेता को अपनी तिल मात्र आलोचना भी बर्दाश्त नहीं होती, उसका नाम क्या है.

स्वाभाविक है कि पिछले चुनाव में इस सत्ता गठबंधन को मिली छप्पड़-फाड़ सफलता का मायाजाल काम कर रहा है.

लालू-रामविलास के ख़िलाफ़ उभरे अगड़ा-अतिपिछड़ा -महादलित रूपी जातीय राजनीति की जीत को कथित विकास वाले मुद्दे की जीत मान ली गई है.

अब इस ग्लोबल मीट पर उठ रहे विवादों पर यहाँ की हुकूमत बिलकुल बेपरवाह दिख रही है. कारण है कि पिछले दिनों यहाँ उभरे कई गंभीर घपले-घोटालों पर विरोध की अकाल मृत्यु हो चुकी है.

सबसे बड़ा विवाद इस 'ग्लोबल मीट' को लेकर ये है कि पांच साल पहले इसी तरह के आयोजन का जब कोई फ़ायदा नहीं हुआ तो फिर से वैसा ही आयोजन क्यों?

इस सम्मलेन में किसी वक्ता ने बिहार में भ्रष्टाचार का ग्राफ़ सबसे ऊंचा होने जैसे ज्वलंत सबूत पर सवाल नहीं उठाया.

किसी ने ये जानना भी नहीं चाहा कि फारविसगंज में पुलिस की गोलियों से मारे गये और बूट से कुचले गये ग़रीब मुसलामानों के परिजन से मुख्यमंत्री मिलने क्यों नहीं गए?

यहाँ इंदिरा आवास योजना से लेकर रोज़गार गारन्टी योजना तक, और सर्वशिक्षा अभियान से लेकर आँगन बाड़ी योजना तक फैला हुआ भ्रष्टाचार अनियंत्रत है, किसे नहीं पता?

लेकिन ग्लोबल अतिथि के लिए तो ये सारे सवाल बेमानी थे, क्योंकि स्वघोषित सुशासन का आतिथ्य उन पर भारी था.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

इसी विषय पर और पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.