गुजरात: गोधरा में अभी भी बची हुई है इंसानियत

Image caption गिरिजा शंकर और मीना बेन मुस्लिम बच्चों को पूरी लगन से पढ़ाते हैं.

गोधरा में हिंदू मुस्लिम समुदायों के बीच अविश्वास का माहौल भले ही हो लेकिन इसी शहर में गिरिजा शंकर जैसे भी लोग हैं जो हिंदू होने के बावजूद दंगा पीड़ितों के बच्चों को पूरी लगन से पढ़ाने का काम करते हैं.

गोधरा के आसपास के इलाक़ों में हुए दंगों में कई लोगों के घर बर्बाद हुए और वो खाली हाथ यहां पहुंचे. इन लोगों को अमन सोसायटी नामक जगह पर घर दिए गए हैं और यहीं बच्चों के लिए एक स्कूल भी है.

इस स्कूल में दो ही शिक्षक हैं गिरिजा शंकर आर प्रजापति और मीना बेन.

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गोधरा में मुलाकातों के दौरान मुसलमानों के बारे में लोगों की राय अच्छी नहीं दिखती है लेकिन गिरिजा शंकर और मीना बेन से मिलने पर लगता है कि इंसानियत अभी मरी नहीं है.

गिरिजा शंकर कहते हैं, ‘‘ देखिए मैं तो ट्रांसफर लेकर आया था इस स्कूल में. मैं पहले जहां पढ़ाता था वहां सब हिंदू बच्चे थे. पैसे वाले थे. वो पढ़ते नहीं थे. यहां बच्चे गरीब हैं. मां बाप दूर से आए हैं. कुछ बच्चों के तो मां बाप भी नहीं है दंगों के कारण लेकिन ये बच्चे अच्छे हैं. सीखते हैं.’’

स्कूल में बीसेक बच्चे हैं जिनके परिवार दंगों के कारण यहां आए. इनके अलावा आस पास के आदिवासी बच्चे भी यहां पढ़ने आते हैं.

गिरिजा शंकर बताते हैं, ‘‘ छोटे बच्चे हैं. कुछ तो स्कूल आना नहीं चाहते तो हम उन्हें घर से लेकर आते हैं. बदमाशी भी करते हैं बच्चे लेकिन हमने कभी मारा नहीं किसी को. 2005 में ट्रांसफर का समय था तो मैंने खुद ही चुना यह स्कूल.’’

लेकिन क्या उन्हें डर नहीं लगता मुस्लिम इलाके में नौकरी करने में, वो कहते हैं, ‘‘ किस्मत में लिखा होगा कि मुसलमान मार डालेगा तो वो कहीं भी हो सकता है. जैसे कर्म करेंगे वैसा ही भोगेंगे. लेकिन यहां डर नहीं लगता. क्यों लगेगा. हम तो अच्छे कर्म करने में यकीन रखते हैं.’’

Image caption कौसर कहती हैं कि उन्हें हिंदुओं ने ही दंगाईयों से बचाया.

आस पास के लोग और दोनों ही शिक्षक कहते हैं कि स्कूल के लिए इमारत नहीं हैं.

दंगा पीड़ितों के लिए बने दो कमरों के घर में ही स्कूल चलता है और ये एक बड़ी परेशानी है शिक्षकों के लिए.

इसी सोसायटी में अज़रा हुसैन, ज़ाबिर भाई और जावेद भाई सब रहते हैं जिनकी शिकायतें सरकार से अभी भी बरकरार है लेकिन वो इस बात से खुश हैं कि उनके बच्चों को शिक्षा मिल रही है.

जावेद भाई कहते हैं, ‘‘ अभी ये स्कूल है तो बच्चे पढ़ लेंगे. दिक्कतें तो कई हैं. हम अपना घर बार छोड़कर यहां आए. हमारे रिश्तेदार मारे गए. अब क्या कर सकते हैं. किसी तरह जीना तो है.’’

गुजरात में दंगों के दौरान मुसलमान मारे तो गए लेकिन कई इलाक़ों में हिंदुओं ने मुसलमानों की जान भी बचाई.

अमन सोसायटी में रह रहीं कौशर इब्राहिम मंसूरी कहती हैं, ‘‘ मैं साबरकांठा में थी. वहां मुझे लोगों ने भैंसों के तबेले में रखकर बचाया. मारने भी हिंदू आए थे और बचाया भी हिंदूओं ने. हमारा घर जला दिया गया. बर्तन लूट लिया गया. बगल के गांव के हिंदुओं ने हमें बचाया. उन्होंने हमें दस दिन तक छुपाए रखा.’’

गुज़रात में भले ही बहुसंख्यक आबादी मुस्लिमों के ख़िलाफ़ दिखती हो लेकिन अभी भी इंसानियत में यकीन रखने वाले लोग हैं और यह बात एक आस ज़रुर बंधाती है.

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