उत्तर प्रदेश चुनाव: बेटी को विदा किए बिना चला गया बाबुल...

Image caption राजन लाल की यूपी चुनाव में पीठासीन अधिकारी के तौर पर नियुक्ति हुई थी

राम सुमेर लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज अस्पताल के अंदर बनी एक पुलिस चौकी के बाहर ख़ामोश खड़े हैं. आँखें नम हैं, लेकिन बहुत कुछ कहने को बेकरार.

राम सुमेर के पिता का शव अस्पताल के मुर्दा घर में रखा हुआ है. औपचारिकताएँ पूरी करने के लिए वे अपने सगे-संबंधियों के साथ अस्पताल में मौजूद हैं. लखनऊ में मतदान के दिन राम सुमेर के पिता की मौत हो गई है.

राम सुमेर के पिता राजन लाल लखनऊ के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे और चुनाव में पीठासीन अधिकारी के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई थी. लेकिन उन्हें क्या पता था कि मतदान शुरू होने के साथ ही उनकी साँसें बंद होने वाली है.

रुँधे गले से राम सुमेर कहते हैं, "सुबह यहाँ से फोन गया कि तुम्हारे पापा की तबीयत ख़राब है. मुझे बताया गया कि जल्दी से आ जाओ. मैं जब अलीगंज पहुँचा, तब तक मेरे पिताजी की मौत हो गई थी."

उन्होंने अपने पिताजी से तड़के बात की थी और उनके पिताजी ने बताया था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं थी. राम सुमेर के पिताजी ने अपने बेटे से आने की बात कही थी. लेकिन बेटे को आते-आते देर हो गई.

ज़िम्मेदारी की थकान...

इस पूरी घटना के एक और दुखद पहलू है. राजन लाल की बेटी की शादी इसी 17 फरवरी को हुई थी. और बेटी की शादी के दो दिन बाद ही उनकी मौत हो गई.

चुनाव ड्यूटी के कारण राजन लाल को जल्दी ही घर से निकलना पड़ा और वे अपनी बेटी की विदाई से पहले ही ड्यूटी के लिए निकल पड़े.

राम सुमेर बताते हैं, "सत्रह तारीख़ को मेरी बहन की शादी थी. लेकिन पापा की चुनाव में ड्यूटी लगी थी. इसलिए शादी के बाद 18 तारीख़ की सुबह ही पापा ड्यूटी पर चले गए. उस समय मेरी बहन की विदाई भी नहीं हुई थी."

राजन लाल की मौत होने के बाद अधिकारियों के रवैए से राम सुमेर काफ़ी नाराज़ हैं. उनकी शिकायत है कि कोई अधिकारी उनसे मिलने भी नहीं आया है. राम सुमेर सबसे बड़े हैं और अभी पढ़ाई कर रहे हैं. घर में अकेले कमाने वाले उनके पिताजी की चुनावी ड्यूटी के दौरान मौत हो गई है.

कम उम्र में आने वाली बड़ी ज़िम्मेदारी की थकान उनके चेहरे पर अभी से नज़र आने लगी है....

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