आचार संहिता के मामले में क्या कर सकता है चुनाव आयोग?

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Image caption एसवाई कुरैशी, मुख्य चुनाव आयुक्त

केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा को चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन संबंधी नोटिस के बाद जब चुनाव आयोग ने यही कार्रवाई राहुल गांधी पर की तो कांग्रेसी खेमे में हलचल मचना स्वाभाविक था.

कानपुर में एक रोड शो के मामले में राहुल गांधी पर आचार संहिता के उल्लंघन का मामला दर्ज करने के बाद कांग्रेसी नेता चुनाव आयोग पर कुछ ज्यादा ही आक्रामक हो गए.

इस बीच खबरें यहां तक आ गईं कि सरकार चुनाव आयोग के अधिकारों में कमी करने जा रही है और आचार संहिता के उल्लंघन को तय करने का अधिकार अदालत को देने की तैयारी कर रही है.

सवाल और खंडन

लेकिन सवाल उठता है कि इस मामले में चुनाव आयोग के पास कितना अधिकार है और किस हद तक आगे जाकर सख्त कदम उठा सकती है.

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण का कहना है कि आचार संहिता के मामले में आयोग सिर्फ नोटिस जारी कर सकता है, इससे ज्यादा कुछ नहीं.

उनके मुताबिक इसका प्रभाव सिर्फ ये होता है कि नोटिस की बात आम जनता तक पहुंच जाती है और नेता के ऊपर एक जनदबाव पड़ता है. आयोग को इस मामले में किसी तरह की सजा देने का कोई अधिकार नहीं है.

वे कहते हैं, “यदि ये अधिकार भी कोर्ट को दे दिया गया तो फिर आदर्श आचार संहिता की बात ही बेमानी हो जाएगी क्योंकि अदालत में ये तय होने में ही सालों लग जाएंगे कि आचार संहिता का उल्लंघन हुआ है या नहीं.”

भारत भूषण के मुताबिक ऐसा होने पर तो चुनाव आयोग के पास जो हाथी के दिखाने वाले दांत हैं वो भी टूट जाएंगे.

इस बीच, केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने इन खबरों का खंडन किया कि सरकार आचार संहिता को संवैधानिक रूप देने की कोई कोशिश कर रही है.

वहीं विपक्ष ने भी सरकार पर आरोप लगाया है कि वो चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के पर कतरने की कोशिश कर रही है. भाजपा नेता अरुण जेटली ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि यदि सरकार ऐसी कोई कोशिश करती है तो भाजपा उसका पुरजोर विरोध करेगी.

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