कितना बदल गया गुजरात

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

गुजरात के अहमदाबाद में कुछ ही सालों के भीतर काफ़ी परिवर्तन हुए हैं. हर तरफ़ सड़कें चौड़ी की जा रही हैं. नई जगमगाती दुकानें, नए शॉपिंग मॉल और नए बाज़ार हर जगह देखने को मिलते हैं.

यहाँ आकर साफ़ लगता है कि गुजरात प्रगति की राह पर दौड़ रहा है और इसका सेहरा यहाँ के लोग मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर बांधते हैं.

एक शॉपिंग मॉल में जब कुछ महिलाओं से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का राज़ पूछा तो उन्होंने एक साथ कहा, "गुजरात में प्रगति केवल मोदी के कारण हुई है. गुजरात आज सब से ज्यादा तरक्की कर रहा है. इसके लिए मोदी ज़िम्मेदार हैं.''

वो दस साल बाद आज भी राज्य के बेताज बादशाह हैं और लोगों के दिलों की धड़कन. लेकिन इस उन्नति के नीचे से गुजरात का भयानक अतीत कभी-कभी सर उठाता रहता है.

दस साल पहले ये हिंदू-मुस्लिम दंगों की आग में लिपटा हुआ था. हर तरफ मारकाट मची थी. तीन दिनों के अंदर एक हज़ार से अधिक लोगों की हत्या हो गई थी.

हिंसा रामसेवकों से भरी साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगाने के बाद भड़की थी.

'हमें इंसाफ़ चाहिए'

कई रामसेवक जिंदा जला दिए गए थे. शक स्थानीय मुसलमानों पर हुआ था. बदले में मुसलमानों पर हमले हुए थे और उनकी हत्याएं की गई थीं.

Image caption सईद खान कहते हैं कि वे इंसाफ की मांग से पीछे नहीं हटेंगे

अहमदाबाद में गुलबर्ग सोसाइटी के सईद ख़ान के परिवार के 10 सदस्य मरने वालों में शामिल थे.

यहाँ इन घरों में अब कोई नहीं रहता. सईद ख़ान अब 73 वर्ष के हैं. लेकिन वो इंसाफ़ की मांग से पीछे नहीं हटे हैं.

वो कहते हैं, ''हमारी लड़ाई दस सालों से चल रही है. हम उन्नति के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन हमें इंसाफ़ चाहिए. अगर यहाँ इंसाफ़ नहीं मिला तो हमें ऊपर अल्लाह ताला इंसाफ़ देगा."

दंगों के समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंती थे और आज भी हैं. उनके ख़िलाफ़ अब तक इल्ज़ाम है कि उन्होंने हिंसा रोकने के लिए कुछ नहीं किया. वो इन इल्ज़ामों को ग़लत बताते हैं.

लेकिन इन इल्ज़ामों के कारण उनके प्रधानमंत्री बनने के अवसर कम से कम होते जा रहे हैं. वैसे आज गुजरात भारत की आर्थिक सफलता का सबसे बड़ा हिस्सेदार है.

'कैसे मिलेगा इंसाफ'

राज्य में प्रगति और उन्नति की मिसाल हर जगह मिलती है. ये देखते हुए पिछले कुछ सालों में नरेंद्र मोदी को कई अहम लोगों का समर्थन प्राप्त हुआ है. यहाँ तक की सुपर स्टार अमिताभ बच्चन भी गुजरात में पर्यटन का प्रचार करते हैं.

Image caption मोहम्मद शरीफ कहते हैं कि वो मायूस हैं लेकिन उन्होंने इंसाफ की उम्मीद नहीं छोड़ी है

मैंने गुजरात के युवाओं की राय जानने के लिए माइका नामी एक संस्था का दौरा किया, जहां भारत भर से होनहार लड़के-लड़कियां पढ़ने आते हैं.

यहाँ जिससे भी बात की, वो ये मानने के लिए तैयार नहीं थे कि गुजरात के लोग अब दस साल पुरानी बातें भूल चुके हैं और आगे बढ़ चुके है.

उनमें से एक ने कहा, "हम उसी समय ये बात मानने को तैयार होंगे जब गुजरात में दंगा पीड़ितों को इंसाफ़ मिलेगा".

एक दूसरी छात्रा ने कहा, "जिन लोगों पर दंगों का सीधे तौर पर असर नहीं हुआ, उनके लिए हिंसा की यादें भूलना आसान है लेकिन जिनकी संपत्ति बर्बाद हुई या जिनके लोग मारे गए, उनके लिए आगे बढ़ना मुश्किल होगा."

शायद ये बात सही हो क्योंकि दंगों में मोहम्मद शरीफ़ ने अपनी पत्नी सहित दो बेटियों को खोया था. वो इंसाफ़ की लड़ाई में थोड़े मायूस ज़रूर नज़र आते हैं, लेकिन नाउम्मीद नहीं हुए हैं.

वो कहते हैं, "हम लोगों की सीधी लड़ाई राज्य सरकार से है, पुलिस से है. लेकिन जब वो ही लोग फैसला करेंगे जो दंगों में शामिल थे तो इंसाफ़ कैसे मिलेगा. फिर भी हम मुक़दमा लड़ते रहेंगे और उम्मीद करते रहेंगे कि आख़िरकार हमें इंसाफ़ मिलेगा."

राज्य की प्रगति अपनी जगह पर, लेकिन सईद खान, मोहम्मद शरीफ़ और दूसरे दंगा पीड़ित लोग कहते हैं कि वो इंसाफ़ की लड़ाई जारी रखेंगे.

संबंधित समाचार