भारत में हड़ताल का मिला जुला असर

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केंद्र सरकार की 'कर्मचारी-विरोधी' नितियों और बढ़ती महंगाई के विरोध में मंगलवार की हड़ताल में लाखों कर्मचारी भाग ले रहे है.

इस हड़ताल से बैंकों, यातायात, डाकघरों और बंदरगाहों पर प्रभाव पड़ा है.

अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के नेता गुरुदास दासगुप्ता ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया कि हड़ताल को देश भर में बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली है.

दासगुप्ता के अनुसार इसका कारण ये हैं कि ट्रेड यूनियन मिलकर हड़ताल कर रहे हैं.

उधर उद्योगों की संस्था एसोचैम ने कहा है कि ऐसी हड़तालें जिनसे देश को 10,000 करोड़ का नुकसान होता हो, उसका कोई औचित्य नहीं है और ट्रेड यूनियनों को सीखना होगा कि आर्थिक मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे से दूर रखा जाए.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार हड़ताल से केरल में सुबह से ही आम जीवन काफी प्रभावित हुआ है. सड़कों पर बसें नहीं चल रही हैं जबकि दुकानें भी बंद हैं. इसके इलावा बैंकों में भी हड़ताल का असर हुआ है.

समाचार एजेंसी का कहना है कि उधर कोलकाता में हड़ताल का कोई खास असर नहीं दिख रहा है.

इसकी वजह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चेतावनी भी हो सकती है कि काम पर न आने पर इसे कर्मचारियों की नौकरी में ब्रेक माना जाएगा.

वहीं बिजली जैसी ज़रूरी चीजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली सरकार ने एस्मा लागू किया है.

कई वर्षों में पहली बार वैचारिक मतभेद को पीछे छोड़कर देश के सभी मजदूर संगठनों ने यूपीए सरकार के खिलाफ एक दिन की इस हड़ताल का ऐलान किया है.

सभी ट्रेड यूनियन एकजुट

आरएसएस, वामपंथी दल, शिवसेना, मुस्लिम लीग आदि से जुड़े सभी ट्रेड यूनियन नेता एक मंच पर आए हैं और अपनी मांगों को लेकर यह हड़ताल कर रहे हैं.

उधर एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने कहा कि मजदूरों को समझना होगा कि नौकरियाँ आर्थिक बढ़ोत्तरी और निवेश से जुड़ी हुई हैं.

रावत ने एक वक्तव्य में कहा कि मौजूदा कानून मजदूरों के हित बचाने के लिए काफी है और बंद की वजह से कई राज्यों के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचा है.

ऐसोचैम जैसे संघों की आलोचना पर दासगुप्ता ने कहा कि ऐसी संस्थाएँ गरीबों का ख्याल नहीं करती हैं.

उन्होंने कहा, “गरीब लोगों को एक दिन का रोजी जाएगा लेकिन उनकी जिंदगी में जो समस्या है उसके खिलाफ उनके लिए लड़ाई करना जरूरी है. ये उनकी कुरबानी है.”

उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियन भारत के लिए अभी भी प्रासंगिक हैं और ये कहना गलत होगा कि ट्रेड यूनियन में नया खून नहीं आ रहा है.

दासगुप्ता ने कहा, “हमारी उम्र जरूर ज्यादा है, लेकिन हमारे साथ जो है, जो रोज रोज मजदूर हमारे साथ आते हैं, आप उन्हें देखिए. आप हमें देखते हैं, हमारे 34 लाख सदस्यों को नहीं देखते हैं.”

उन्होंने कहा कि देश में वित्तीय संकट के चलते सभी ट्रेड यूनियन एक ही मंच पर आने के लिए मजबूर हो गए हैं.

भारतीय मजदूर संघ के महासचिव बैजनाथ राय का कहना है कि ऐसा केवल केंद्र में ही नहीं, राज्यों में भी है कि सभी श्रमिक नेता एक साथ हैं.

महंगाई और कर्मचारियों की नीतियों के इलावा न्यूनतम वेतन न देना, ठेके पर नौकरी पर रखना और असंगठित मजदूरों के कानून का पालन न होना भी मांगों में शामिल है.

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