नीलगाय और नरेगा ने बढ़ाई मुश्किलें

अतुल त्यागी
Image caption अतुल त्यागी को लगता है कि सरकारों ने किसानों की कभी नहीं सुनी.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नहटोर विधानसभा क्षेत्र के अमहेड़ गांव में गन्ना उगाने वाले अतुल त्यागी बोलते बोलते नाराज़ हो जाते हैं.

नरेगा, नीलगाय और सरकार ने किसानों का जीना हराम कर रखा है और यही नौबत रही तो किसान आत्महत्या करने को मज़बूर हो जाएगा!

वो कहते हैं कि विधानसभा चुनाव तो हो रहे हैं लेकिन इसमें किसानों की सुध कोई पार्टी नहीं लेती है.

उनके साथ बैठे दो औऱ किसान अमित त्यागी और नरेश त्यागी की भी नाराज़गी साफ दिखती है.

अतुल बताते हैं, ‘‘इस इलाके की ज़मीन अच्छी है उपजाऊ है. किसान मेहनत करता है. हम मेहनत करते हैं लेकिन सरकारी नीतियां ही हमारे ख़िलाफ़ हो रही हैं.’’

लेकिन कैसे, अतुल बताते हैं, ‘‘हम गन्ना उगाते हैं. पहले यहां कई मिलें थीं. सब बंद हो गईं और अब प्राइवेट मिलें हैं. अभी तो वो सरकारी दाम तय करते हैं लेकिन जब ये अपने मन से दाम करने लगेंगी तो सोचिए क्या होगा. 2007 में दाम की गड़बड़ हुई थी तो कोर्ट में गया था मामला. उसका पैसा अभी तक नहीं मिला है. पांच साल हो गए हैं.’’

समस्या

क्या यही एक समस्या है?

अतुल कहते हैं, ‘‘बिजली का वादा किया था सरकार ने, 20 घंटे बिजली का. लेकिन अभी भी छह-सात घंटे से अधिक बिजली कभी नहीं आती है. किस पर भरोसा करें. चकबंदी आफिस ने लोगों का जीना हराम कर दिया है इतना भ्रष्टाचार है. आप ज़मीन खरीदिए. लिखा-पढ़ी के लिए जाइए, तो होगी नहीं जब तक आप पैसा नहीं देंगे.’’

Image caption नरेश त्यागी अपने खेतों पर नीलगाय के कहर से परेशान हैं.

अतुल सवाल पूछने का मौका नहीं देते, कहते हैं, ‘‘ऊपर से ये नरेगा ने और जीना हराम कर दिया है किसानों का. मज़दूर मिलते नहीं हैं खेतों में काम करने के लिए. सारे मज़दूर नरेगा में चले जाते हैं. तो हम क्या करेंगे. ये सरकारी नीतियां हमें आत्महत्या करने पर मज़बूर कर रही हैं.’’

नीलगायों का आतंक

अतुल और बोलना चाहते हैं लेकिन तभी नरेश कहते हैं, ‘‘आप हमारी एक और समस्या सुन लो. यहां नीलगायों का आतंक है. पूरी गन्ने की फसल खराब कर देते हैं. जंगल कटा तो नीलगायें बढ़ गई हैं. सरकार इन्हें मारने का परमिशन नहीं देती है. खेती बर्बाद हो रही है.’’

वो कहते हैं कि ये मुद्दा कई रैलियों में भी उठा है लेकिन जंगली जानवरों से सरकार का स्नेह किसानों को महंगा पड़ रहा है.

चाहें नरेश हो या अमित या अतुल, इनकी आर्थिक स्थिति बेहतर लगती है लेकिन अतुल कहते हैं, ‘‘देखिए किसान वही आत्महत्या करता है जो कर्ज़ लेता है. किसान कर्ज़ लेता है जब उसके पास अच्छी ज़मीन होती है. हम मुश्किल से खेती कर रहे हैं. खेती के साथ दूसरा काम भी करते हैं. सिर्फ खेती पर गुज़ारा नहीं हो पाता है. अगर हम भी कर्ज़ लेने लगें तो बर्बाद हो जाएंगे.’’

किसानों की समस्याएं लंबी हैं. चाहे गन्ना किसान हो या कोई और किसान लेकिन इन चुनावों में किसानों के लिए वादों के अलावा कुछ नहीं दिखाई पड़ता है.

किसान बदलाव चाहते हैं लेकिन उन्हें उम्मीद किसी विकल्प से भी कम ही है.

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