‘गरीबों का खून मीठा लगता है इनको’

 बुधवार, 29 फ़रवरी, 2012 को 05:32 IST तक के समाचार
पीताम्बर

पीताम्बर गरीब ज़रुर हैं लेकिन मेहनत से पीछे नहीं हटते है.

पॉलिटिक्स में कब क्या हो जाए ये तो नहीं पता लेकिन हमारा काम तो ठीक ही चलता है.

पीताम्बर सिंह किसी और के खेत में गन्ना काट रहे हैं लेकिन उनके चेहरे पर कोई निराशा नहीं है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धामपुर जिले में कम जमीन वाले कई किसान हैं.

पीताम्बर हंसते मुस्कुराते हुए बात करते हैं और कहते हैं कि उन्हें कोई दुख नहीं है और किसी राजनीतिक दल से कोई उम्मीद भी नहीं.

वो कहते हैं, ‘‘दिक्कत जो है वो बड़े लोगों को है, बड़े किसानों को, क्योंकि वो काम नहीं करना चाहते हैं. उन्हें मज़दूर चाहिए खेतों में काम करने के लिए. हम तो अपना काम खुद करते हैं और जब फुर्सत होती है तो दूसरे के खेतों में भी काम करते हैं.’’

लेकिन क्या सरकार ने किसानों की देखभाल की है?

"सभी के पास उतने की खेत हों जितना वो जोत सके अपने हाथ से. मज़दूर क्यों मिलेगा. बड़े लोग पैसा नहीं देना चाहते मज़दूर को. गरीबों का खून मीठा लगता है इनको."

पीताम्बर सिंह, किसान

पीताम्बर कहते हैं, ‘‘कोई किसी की देखभाल थोड़े न करता है. अब नरेगा आया है लेकिन हमारा नाम उसमें भी नहीं है तो क्या दुखी हो जाएं. हमारे पास थोड़ी जमीन है उसमें खेती करते हैं. मेहनत मजूरी करते है.बाल बच्चों को पढ़ाते हैं.’’

लेकिन बड़े किसान तो शिकायत करते हैं कि बिजली नहीं है गन्ने का सही दाम नहीं मिलता है?

पीताम्बर कहते हैं, ‘‘उनके हाथों में दम नहीं है. संतोष नहीं है बड़े किसानों को. अपने हाथ से काम नहीं करना चाहते इसलिए उन्हें समस्या है. हमारे लिए तो ठीक है.’’

लेकिन बड़े किसान मज़ूदर न मिलने की शिकायत भी करते हैं, पीताम्बर कहते हैं, ‘‘सभी के पास उतने की खेत हों जितना वो जोत सके अपने हाथ से. मज़दूर क्यों मिलेगा. बड़े लोग पैसा नहीं देना चाहते मज़दूर को. गरीबों का खून मीठा लगता है इनको.’’

पीताम्बर गरीब ज़रुर हैं लेकिन मेहनत से पीछे नहीं हटते है.

जब खेतों में काम नहीं होता तो वो नल ठीक करने का और बढ़ई का काम भी करते हैं.

उनके चेहरे पर मेहनत का पसीना झलकता है और आत्मविश्वास दिखाई पड़ता है जबकि बड़े किसानों के चेहरे मलिन और शिकायतों से भरे दिखते हैं.

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