ज़्यादा माइनिंग ज़्यादा माओवाद: जयराम

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Image caption जयराम रमेश के बयानों से विवाद खड़ा हो जाना कोई नई बात नहीं है.

केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के खनन पर एक बयान से सरकारी खनन नीतियों पर नया विवाद खड़ा हो गया है.

बुधवार को रांची एक जगह बोलते हुए जयराम रमेश ने कहा था "अधिक माइनिंग का अर्थ है अधिक माओवाद."

झारखंड में सारंडा के जंगलों में उत्खनन के बारे में बोलते हुए जयराम ने कहा था, "इस तरह के इलाकों में केवल सेल या स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया को ही माइनिंग की इजाज़त दी जानी चाहिए." इस बयान पर हर तरफ से प्रतिक्रया आ रही है.

विरोध

जयराम के बयान का विरोध उद्योग धंधों से जुड़े लोग भी कर रहे हैं और वो भी जो निजी पूँजी के खिलाफ हैं.

उद्योग धंधों के संगठन फिक्की में महासचिव डॉ राजीव कुमार ने बीबीसी से बात करते हुए कहा " अगर हिन्दुस्तान में हम लोगों ने कहा कि ज़्यादा माइनिंग यानी ज़्यादा माओवाद तो इस देश में माइनिंग बंद हो जाएगी."

कुमार आगे कहते हैं, " खुदा ना करे कि यह उनका स्टैंड हो. अगर ऐसा वो ऐसा वाकई मानते हैं तो फिक्की की नज़र में तो यह गलत ही है."

फिक्की महासचिव यह भी कहते हैं कि भारत में खनन को लेकर इस तरह के नियम बना दिए गए हैं कि बड़ी कम्पनियां को साफ़ सुथरे ढंग से पूरी दुनिया में काम करती हैं वो यहाँ नहीं कर सकतीं. उनके अनुसार बेल्लारी में यही हुआ जहाँ सरकारी माहौल के वजह से वो खिलाड़ी हावी हो गए जो अच्छे ढंग से काम करना ही नहीं जानते.

झारखण्ड में खनन की वजह से विस्थापित होने वाले आदिवासियों के बीच काम करने वाले शशिभूषण पाठक कहते हैं कि इस तरह के बयान जयराम का नाटक हैं.

पाठक कहते हैं, " ऐसा कुछ नहीं है कि माइनिंग की वजह से माओवाद बढ़ा हो. इस वजह से निजी कंपनियों के हाथों लोगों का शोषण बढ़ा है. लोग विस्थापित हो रहे हैं और ऐसे में माओवाद उनके सामने एक विकल्प पेश करता है. यह दरअसल विकास के एक मॉडल की लड़ाई है."

बयान अभी क्यों?

पर यह बयान जयराम रमेश ने अभी क्यों दिया? इस सावाल के उत्तर में सामजिक कार्यकर्ता और खनन के क्षेत्र में कई जनहित याचिकाएं दायर कर चुके सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं कि दिल्ली में कोयला खदानों पर मंत्री समूह की बैठक है.

श्रीवास्तव के अनुसार इस मंत्री समूह को यह तय करना है कि देश में जिन कोयला क्षेत्रों में पहले खनन की अनुमति नहीं दी गई थी वहां अब अनुमति कैसे और किन परिस्थितियों में दी जाय.

देश में अभी कुल कोयला क्षेत्रों का करीब 16 फ़ीसदी कोयला उन इलाकों में आता है जहाँ घने जंगल हैं. इस तरह से करीब 20 फ़ीसदी लोहा भी घने जंगलों के नीचे दबा हुआ है.

साल 2009 में जयराम रमेश के नेतृत्व में पर्यावरण मंत्रालय ने देश में बहुत से घने जंगलों वाले इलाकों को 'नो गो एरिया' या ऐसा इलाका करार दे दिया जहाँ माईनिंग नहीं की जा सकती. इस फैसले से हंगामा खड़ा हो गया और कोयला मंत्रालय ने पर्यावरण मंत्रालय को खुली चुनौती दे डाली.

बाद में यह मामला सुलह सफाई के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय पहुँच गया.

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