चुनाव की चर्चा, खर्चा ही खर्चा

 रविवार, 4 मार्च, 2012 को 06:00 IST तक के समाचार
चुनाव प्रचार

जब भी चुनाव से जुड़े व्यवसाय की बात आती है तो उसका मतलब अक्सर राजनीतिक लेन-देन से जोड़कर देखा जाता है.

लेकिन चुनाव की पूरी प्रक्रिया कुछ ख़ास तरह की व्यावसायिक गतिविधियों को भी जन्म देती है.

लखनऊ में चुनाव प्रचार की गतिविधियां के अंतिम पड़ाव में, टेम्पो ट्राली ड्राइवर रवि सिंह को रोज़ी रोटी की चिंता ने फिर से सताना शुरू कर दिया था.

पिछले दो महीनों में, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों ने लॉरियों और मिनी बसों को चुनाव प्रचार के लिए ढाई-तीन हज़ार रूपए रोज के दर से किराए पर बुक कर रखा था.

हाल के दिनों में धंधा इतना बढ़िया कभी नहीं रहा.

ग्राहक

गाड़ी पर लगाए गए बैनरों-झंडों और साउंड सिस्टम को हटाने में मशगूल रवि सिहं ने कहा, “हम खर्च वगैरह छोड़कर रोज 600 से 700 रूपए बचा ले रहे थे. अब फिर से काम ढूंढेगे. लेकिन रोज ग्राहकों का मिलना मुश्किल हो रहा है.”

हालांकि प्रचार ट्रक पर एनाउंसर के तौर पर काम करने वाले अजय यादव का मामला कुछ दूसरा था, उनकी अपनी राजनीतिक अंकाक्षा है, और वो “आगे मेवा मिलने की उम्मीद में सेवा” में लगे थे.

उधर उम्मीदवारों की राजनीतिक अंकाक्षाओं ने पुराने लखनऊ में रहने वाले मंगलू पंडित को उनकी जीत के लिए पूजा और यज्ञ आयोजित करवाने में इस कदर व्यस्त कर रखा था कि उन्हें बात करने तक की फुरसत नहीं थी. मगर वो इन उम्मीदवारों के नाम बताने से सिरे से इंकार करते हैं.

चुनावी व्यय

हालांकि चुनाव में खर्चें पर कोई सटीक आंकड़ा मौजूद नहीं लेकिन एक अपुष्ट अनुमान के मुताबिक साल 2009 भारतीय संसदीय चुनावों में तीन अरब डालर ख़र्च हुए थे– इसके मुक़ाबले पिछले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव का कुल ख़र्च 2.4 अरब डॉलर था.

कांग्रेस

राजनीतिक दल घोषणापत्रों और दूसरी चुनाव सामग्रियों पर ख़ासा धन ख़र्च करते हैं.

इस विधानसभा चुनावों में भी, जबकि चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के खर्चों पर पैनी नजर रखी हुई है, सोलह लाख रूपये के तय दायरे में भी मैदान में मौजूद केवल नौ हजार से अधिक प्रत्याशी 144 करोड़ रूपए व्यय करेंगे.

इसमें वो खर्च शामिल नहीं जो बड़े राजनीतिक दलों की केंद्रीय इकाइयां घोषणा पत्रों, गीतों के संकलन, उनके आडियो और विडियो सीडी जारी करने, समाचार पत्रों और टेलीवीजन पर दिए जाने वाले इश्तिहारों पर खर्च करते हैं.

विज्ञापन

टेलीवीजन कार्यक्रमों पर विभिन्न तरह के आंकड़े इकट्ठे करनेवाली संस्था टैम एड-एक्स के अनुसार साल 2011 के कुल राजनीतिक विज्ञापनों का 51 फ़ीसदी पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच, यानि अप्रैल 2011, के दौरान प्रसारित हुआ.

चुनाव विशेषज्ञों यानि सेफोलॉजिस्टों की बढ़ती तादाद भी मुख्यत: टीवी चैनलों के चुनावी कार्यक्रमों की लोकप्रियता की देन है.

‘पेड न्यूज़’ यानि चुनाव के दौरान पैसे देकर अपने पक्ष में छपवाए गए समाचार का मामला तो इतना गरमाया कि चुनाव आयोग ने इस पर रोक लगाने के लिए समाचार पत्रों को निर्देश जारी किए.

विमान

एक पार्टी के नेता ने कहा कि राजनीतिक दल चुनाव में सबसे अधिक खर्च विज्ञापनों और विमान किराए पर लेने पर व्यय करते हैं.

दिल्ली-स्थित कंपनी इंपीरियल एयर के प्रमुख मानव सिंह कहते हैं कि जनवरी और फरवरी के महीने में उनके सातों विमान पूरी तरह से बुक रहे.

मानव सिंह कहते हैं, “हमने तकरीबन 600 घंटों की उड़ान भरी जो फ़्लाइंग टाइम के हिसाब से बहुत बढ़िया है.”

लखनऊ का फ़ाईव स्टार ताज होटल पूरी तरह से बुक रहा.

होटल के डिप्टी सेल्स मैनेजर शबाहत हुसैन कहते हैं कि क्या होटल, क्या हवाई कंपनी बल्कि ये तो टैक्सी वालों से लेकर, केटर्रस तक के लिए धंधे का सबसे अच्छा समय होता है.

मंदा

उत्तराखंड

पांच राज्यों में हुए चुनाव में क़रीब 9000 उम्मीदवार मैदान में हैं.

लेकिन चुनाव आयोग की सख़्ती से लागू होने से प्रचार के परंगरागत सामग्री जैसे झंडे-पोस्टर बेचने वालों का धंधा मंदा हुआ है जिसके कारण उन्हें तैयार करने वालों को काम नहीं मिल पाया.

बबली कहती हैं कि झंडे, बैनर की सिलाई, छपाई करने का उनका कारखाना इस बार ज़्यादातर बंद पड़ा रहा और उन्हें कुल दो से तीन दिनों का काम ही मिला.

शायद इसलिए भी लोगों का रूझान टेकनालॉजी की तरफ़ बढ़ रहा है.

तीन पीढ़ियों से प्रचार सामग्री का थोक और ख़ुदरा व्यापार में लगे, अनूप अग्रवाल ने ‘वॉइस और टेक्सट’ मोबाइल संदेश भेजने के लिए नई कंपनी स्थापित की और राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को तकरीबन सात लाख संदेश भेजे.

कॉल सेंटर

हालांकि वो कहते हैं कि काफी लोग अभी भी अंग्रेज़ी में भेजे गए मैसेज नहीं पढ़ पाते हैं और हिंदी मैसेज हर जगह उपलब्ध करवाने में तकनीकी दिक़्कते हैं.

वो कहते हैं, "अगर उम्मीदवारों को लगता है कि उन्हें इससे फायदा हुआ है तो अगली बार धंधा और बढ़ेगा.”

इस चुनाव में लगभग सभी राजनीतिक दलों ने पहली बार काल सेंटर स्थापित किए जिसके लिए स्टाफ और मशीनें काम पर लगाए गए.

कांग्रेस के काल सेंटर की निगरानी कर रहे शहज़ाद पूनावाला ने कहा, “हमारा आईडिया था कि उम्मीदवार और कार्यकर्ताओं को एक ऐसा टेलीफ़ोन नंबर उपलब्ध हो जहां वो किसी भी आकस्मिक स्थिति या किसी विषय पर पार्टी की राय जानने के लिए संपर्क कर सकें.”

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