निजीकरण की कोशिशों से कचरा उठाने वाले परेशान

Image caption कूड़ा उठाने वालों को बाकायदा क्लास लगाकर प्रशिक्षण दिया जाता है

मध्य मुंबई की एक शांत गली में एक बड़े रिहाईशी इमारत के सामने ढेर सारा कचरा बिखरा पड़ा है.

यहाँ कुछ कुत्ते और एक बिल्ली कचरे में खाना ढूंढ़ रहे हैं. साथ ही दो कमजोर दिख रही महिलाएं भी इसी ताक में हैं कि कुछ काम की चीज इन कचरों में मिल जाए.

यह मंजर मुंबई में जगह जगह देखने को मिल जाएगा. इस कचरे के आस पास गन्दी महक इतनी तेज है कि बर्दाश्त से बाहर.

इन में से एक महिला कहती है, "हम लोग रोज मुंबई आते हैं और इस इलाके में कचड़े से बोतल, कागज और लोहा लक्कड़ निकाल कर उसे रद्दी वालों को बेच देते हैं जो आगे रीसायकिल कारखानों को बेच देते हैं."

इन महिलाओं की तरह हजारों महिलाएं और बच्चे इस धंधे में हैं. मुंबई में हर दिन 6,500 मीट्रिक टन कचड़ा जमा होता है जो भारत में सभी शहरों से सब से ज्यादा है.

कचड़े से रीसायकिल मैटीरियल स्थानीय प्रशासन करती है लेकिन दाल में नमक के बराबर. यह काम अधिकतर यही महिलाएं और बच्चे करते हैं .

लेकिन अब उनकी रोजी रोटी को खतरा हो गया है क्योंकि प्रशासन कचरा उठाने और उसे कचड़े के मैदानों में फेकने की सुविधाओं का निजीकरण करना चाहती है.

मुंबई नगर महापालिका जिसका सालाना बजट 4 अरब डॉलर है, इस काम पर लाखों डॉलर खर्च करती है और इस काम के लिए 27000 लोगों को नौकरी पर रखा है. यह एक बड़ा काम है, एक कठिन काम है. इसीलिए इसका निजीकरण होना जरूरी समझा जा रहा है.

मुंबई के लोग देश में सब से अधिक आयकर देते हैं लेकिन इसके बावजूद उनका शहर गन्दा रहता है. यहाँ लोगों में इस बात को लेकर क्रोध है.

एक महिला ने मुझे बताया कि इसमें लोकल प्रशासन की लापरवाही तो है ही साथ ही नागरिकों की भी गलती है, "हम लोग अपने घरों को तो साफ रखते हैं लेकिन आस पास के इलाकों की परवाह नहीं करते."

निजीकरण का विरोध

निजीकरण के बारे में महानगरपालिका के कचरा उठाने की सुविधाओं के विभाग के अध्यक्ष प्रकाश चंद्रकांत तौसे कहते हैं, "हाँ, हम लोग निजीकरण के बारे में सोच रहे हैं. इस तरफ छोटा सा एक कदम भी उठाया है. हम एडवांस्ड लोकेलिटी मैनेजमेंट ग्रुप बना रहे हैं ताकि कचड़ों को ट्रीट करना और उसे डंपिंग ग्राउंड में फेकने का काम कई इलाकों में बंट जाए."

लोकल प्रशासन ने इस तरफ पहले ही एक अहम कदम उठाया है. मुंबई में तीन डंपिंग ग्राउंड हैं जहाँ शहर का कचड़ा फेंका जाता है.

दोनार का डंपिंग ग्राउंड सब से पुराना है जिसे एक निजी कंपनी के हाथ सौंपा गया है ताकि इसे बंद करने की प्रक्रिया शुरू की जाए.

निजीकरण के खिलाफ कोई नहीं है लेकिन विशेषज्ञों को इस बात की चिंता है कि अगर ऐसा हुआ तो कचरा उठाने वाली हजारों महिलाओं और बच्चों का क्या होगा?

प्रशिक्षण

ज्योति महाशेखर स्त्री मुक्ति संगठन की करता धर्ता हैं और यह संगठन ऐसी महिलाओं को एकजुट करके उन्हें कचड़ा उठाने की ट्रेनिंग दे रहा है. ज्योति महाशेखर कहती हैं, "नगर महापालिका ने वादा किया है की उनको नजरअंदाज नहीं किया जाएगा. लेकिन अब तक कुछ नहीं किया गया है. अगर निजीकरण हुआ तो ये महिलाएं और बच्चे भूखे मर मर जायेंगे."

उनकी संस्था ने अब तक तीन हजार महिलाओं को ट्रेनिंग दी है. ट्रेनिंग में यह बताया जाता है कि सूखे कचरे को कैसे अलग करते हैं. अपनी सेहत का कैसे खयाल रखते हैं और रीसायकिल मटिरिअल को कैसे अच्छे दामों में बेच सकते हैं.

लेकिन ट्रेनिंग हासिल करने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम है. उन हजारों महिलाओं और बच्चों का भविष्य अब भी अनिश्चितता के हाल में है जो मुंबई की सड़कों पर कचड़ा चुनने का काम करते हैं. दिल्ली और पुणे में निजीकरण हो चुका है जहाँ ऐसी महिलाओं और बच्चों को इस में शामिल किया गया है लेकिन मुंबई प्रशासन के पास उनके भविष्य की सुरक्षा का कोई ठोस इंतजाम नहीं.

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