पंजाब में इतिहास बना, अकाली लौटे

Image caption पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के समर्थक जीत की खुशी का जश्न मना रहे हैं

पंजाब में अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन ने इतिहास बनाते हुए सत्ता में दोबारा से वापसी की है.

अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने ज्यादातर अनुमानों को गलत साबित करते हुए पूर्ण बहुमत हासिल किया है.

पंजाब विधानसभा की कुल 117 सीटों में से 56 सीटें अकाली दल के खाते में गई हैं जबकि उसकी गठबंधन सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को 12 सीटें मिली हैं.

कांग्रेस को 46 सीटें मिली हैं जबकि तीन सीटों पर अन्य दलों के उम्मीदवार जीते हैं.

मनप्रीत बादल की करारी शिकस्त

सबसे चौंकानी वाली बात ये रही कि मुख्यमंत्री बादल के भतीजे मनप्रीत बादल की 'पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब' को एक भी सीट नहीं मिली है.

मनप्रीत ने खुद दो सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन दोनो ही सीटों पर उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा.

वहीं मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल और कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह जैसे दिग्गजों को अपने-अपने चुनाव जीतने में कोई मुश्किल नहीं हुई.

Image caption कांग्रेस की ओर से अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री घोषित किया गया था

सभी नजरें लंबी विधानसभा क्षेत्र पर थी जहां प्रकाश सिंह बादल और उनके भाई गुरदास बादल के बीच मुकाबला था. लेकिन मुख्यमंत्री अपने भाई और मनप्रीत के पिता गुरदास बादल पर भारी साबित हुए.

चुनाव से कुछ ही दिन पहले अमरिंदर के छोटे भाई मालविंदर सिंह पार्टी से अलग हो गए थे क्योंकि वे कांग्रेस पार्टी की टिकट मिलने की उम्मीद कर रहे थे. लेकिन उनकी बजाए अमरिंदर के बेटे रनिंदर को टिकट दिया गया था.

रनिंदर की समाना क्षेत्र से हार इस चुनाव में बड़े झटकों में से एक है. हारने वाले बाकी बड़े नामों में बादल की कैबिनट में बीजेपी के मंत्री तिक्शन सूद शामिल हैं.

जालंधर से अकाली उम्मीदवार परगट सिंह (पूर्व हाकी खिलाड़ी), कांग्रेस के मोहम्मद सदीक (गायक) और भाजपा से क्रिकेटर नवजोत सिद्धू की पत्नी नवजोत सिद्धू जैसे मशहूर लोगों को भी चुनावों में कामयाबी मिली है.

जीत की वजह

सवाल ये उठ रहा है कि अकाली-भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत की आखिर क्या वजह रही.

चुनाव के नतीजों से ऐसा लग रहा है कि महंगाई और भ्रष्टाचार (जिस पर अन्ना हजारे का अभियान चला) जैसे मुद्दों को लेकर जनता ने केंद्र में यूपीए सरकार को माफ नहीं किया है. इसे भी पंजाब में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन की एक वजह माना जा रहा है.

पंजाब में परम्परा रही है कि पिछले 46 सालों से हर चुनाव में यहां सरकार बदली है. ऐसा लगा कि अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेसी इसे लेकर कुछ आत्म-संतुष्ट रहे कि राज करने की अब उनकी बारी है.

चंडीगढ़ से वरिष्ट पत्रकार नवनीत शर्मा कहते हैं, ''कांग्रेस का अति-आत्मविश्वास उन्हें ले डूबा.''

इन चुनावों ने अमरिंदर को संदेश दिया है कि सत्ता में आने के लिए पांच महीने नहीं पांच साल काम करना होगा.

प्रकाश सिंह बादल के अनुसार, कांग्रेस की हार के कई कारण रहे जैसे देश में असुरक्षा की भावना, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई.

प्रकाश सिंह बादल फिर होंगे मुख्यमंत्री

दूसरी ओर सुखबीर बादल का नारा कि ‘25 साल करेंगे राज’ कम से कम दस साल तक तो साबित होता दिख रहा है.

अकाली दल को देखकर हमेशा यही लगा कि उनके पास एक योजना है कि वो विकास के नारे पर चुनाव लड़ेंगे.

बादल सरकार बिहार, गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों में दोबारा एक ही पार्टी की सरकार से सबक लेते हुए विकास को नारा बनाती रही.

पिछले पांच सालों में लगातार ये कयास लगाया जाता रहा कि क्या मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल अपने पुत्र सुखबीर बादल को सत्ता की कमान सौंपेंगे. इस बार भी ये सवाल उठना लाजमी है.

क्या 84 वर्षीय बादल इस बार सुखबीर में विश्वास जताते हुए ये कदम उठा सकते हैं?

पार्टी के अध्यक्ष सुखबीर बादल ने साफ किया है कि प्रकाश सिंह बादल ही मुख्यमंत्री होंगे.

मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार हरचरन बैंस ने एक टीवी चैनल को बताया कि बड़े बादल के होते इस सवाल के कोई मायने नहीं हैं.

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