विधानसभा से लोकसभा तक

Image caption जानकारों के मुताबिक विधानसभा चुनाव के नतीजों का लोकसभा चुनाव पर बड़ा असर होने की संभावना है.

माना जाता है कि भारत की संसद का रास्ता उत्तर प्रदेश की विधानसभा से होकर जाता है.

उत्तर प्रदेश में लोक सभा की 80 सीटें हैं और दो साल बाद, 2014 में भारत में आम चुनाव होने हैं.

शायद इसी लिए उत्तर प्रदेश के चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और तमाम बड़े नेता चुनाव प्रचार में जुटे.

बीबीसी से विशेष बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार नीना व्यास ने कहा कि बड़ी राजनीतिक पार्टियों का उत्तर प्रदेश में बुरा प्रदर्शन आम चुनावों पर बुरा प्रभाव डाल सकता है.

2014 आम चुनाव

वर्ष 1998 और 1999 में भारतीय जनता पार्टी ने जब केन्द्र में सरकार बनाई तो उसे उत्तर प्रदेश में 50 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर विजय मिली थी.

लेकिन अब विधानसभा चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन ऐसा रहा है कि वर्ष 2007 में जीती 51 सीटों के मुकाबले इस चुनाव में वो चार सीटें कम ही जीती है.

नीना व्यास ने कहा, “उत्तर प्रदेश में राम मंदिर के आसपास घूमने वाली बीजेपी की राजनीति काम नहीं की है, उसे जितनी अपेक्षा थी, राज्य में वैसा असर बिल्कुल नहीं हुआ है.”

वहीं कांग्रेस का प्रदर्शन भी राज्य में फीका रहा है. राजनीतिक विश्लेशक भारत भूषण कहते हैं कि पहले कांग्रेस की पकड़ बिहार पर कमजोर हुई और अब उत्तर प्रदेश पर.

लोकसभा की 543 सीटों में से बिहार में 40 और उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं.

भूषण कहते हैं, “अगर अगले चुनाव में कांग्रेस को बहुमत में आना है तो बची हुई करीब 420 सीटों में से दो-तिहाई जीतनी होंगी जो कि बहुत मुश्किल है.”

बड़ी राजनीतिक पार्टियों का प्रदर्शन

उत्तर प्रदेश में प्रचार का जिम्मा वरिष्ठ नेताओं जैसे, कांग्रेस में राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह, वहीं भारतीय जनता पार्टी में सुष्मा स्वराज, अरुण जेटली और नितिन गडकरी के पास रहा.

नीना व्यास के मुताबिक, “ये राज्य के चेहरे नहीं हैं, ये आते हैं और चले जाते हैं, इनके सामने मायावती, मुलायम सिंह और अखिलेश यादव जैसे नेता जमीनी नेता के रूप में देखे गए.”

नीना के मुताबिक कांग्रेस और बीजेपी को एक नया नेतृत्व खड़ा करने की जरूरत है और साथ ही दोनों पार्टियों को राज्य में अपनी व्यवस्था को बेहतर करने पर काम करना होगा.

आनेवाले कुछ महीनों में राष्ट्रपति पद का और राज्यपालों के चुनाव होने है, और आगामी संसद सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक भी आएंगे.

नीना व्यास के मुताबिक पांच वर्षों बाद सत्ता में आई समाजवादी पार्टी, केन्द्र से जल्द झगड़ा नहीं मोल लेना चाहेगी, लेकिन ये जरूर है कि कांग्रेस को एक सहयोगी दल के नाते उसे सभी अहम् फैसलों के बारे में जानकारी देते रहना होगा.

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