ये बाइकर नहीं, बाइकरनी हैं!

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

गाड़ी-वाड़ी एक तरफ और दुपहिया मशीन एक तरफ़...बाइक राइड का मजा अलग ही होता है.

बाइक की पिछली सीट बैठ कर मैंने कई बार राइड का आनंद लिया है.

लेकिन इस बार बात कुछ खास है...

सड़क पर लोग हमें हैरान, परेशान सी नजरों से देख रहे हैं. कुछ बाइकर बेवजह ओवरटेक करने की कोशिश कर रहे हैं.

आखिर एक औरत बुलेट चला रही है भई!

मिलिए 46 वर्षीय शबनम अकरम से, जो उन चंद महिलाओं में से एक हैं जो बाइक चलाती हैं.

शबनम पिछले 21 सालों से बुलेट चलाती आ रही हैं और इस मशीन की आवाज उन्हें संगीत से कम नहीं लगती.

जब ये बुलेट चलाती हैं तो उसके भारीपन पर इनका आत्मविश्वास हावी हो जाता है...धूल-मिट्टी से मानो इनका एक दोस्ताना रिश्ता हो.

असहज पुरुष

जब सर पर हैलमेट और हाथों में ग्लव्स पहने हुए अपनी बुलेट पर वे बाहर निकलती हैं, तो लोगों को ये बात कुछ हजम नहीं होती.

रोज-रोज सड़क पर इनका सामना चौंकाई हुई नजरों से होता है.

शबनम ने बताया कि एक बार तो कुछ पुरुषों ने ऐसी प्रतिक्रिया दी जैसे मानो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई हो.

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बाइक पर सवार शबनम ने बताया, “एक बार मैं और मेरी एक महिला मित्र बाइक पर सवार थे. रास्ते में ट्रैफिक सिग्नल जब लाल हुआ और हम रुक गए. मेरे साथ खड़ी एक मारुति गाड़ी में पांच पुरुष बैठे थे. उनमें से एक चिल्लाया – अरे! ये देखो! बाइक चलाने वाली भी महिला और पिछली सीट पर भी महिला! . उसके बाद आस-पास मौजूद सभी लोग मुझे अजीब सी नजरों से देखने लगे. लेकिन उनमें से कुछ लोगों की नजरों में मैं अपने लिए इज्जत भी देख पा रही थी.”

शबनम इलाहबाद के एक पारंपरिक मुसलमान परिवार से हैं. दिल्ली के विपरीत इलाहबाद में उन्हें बाइक पर देख कर पुरुषों ने आश्चर्य के बजाय घृणा व्यक्त की.

इलाहबाद में एक बार जब शबनम बाइक चला रही थीं, तो एक युवक ने उन्हें धक्का देने की कोशिश की.

शबनम कहती हैं कि कुछ पुरुषों को उन्हें बुलेट चलाते देख असहज महसूस होता है, लेकिन ऐसे पुरुषों को वे ‘कमजोर पुरुष’ की संज्ञा देती हैं.

बाइकरनी गैंग

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Image caption शबनम बाइकरनी असोसिएशन की एक सदस्य हैं. ये गैंग पिछले साल बुलेट पर सवार हो कर दिल्ली से लेह तक गया था

क्या आपको मालूम था कि भारत में महिला बाइकरों का एक गैंग है और उसका नाम ‘बाइकरनी गैंग’ है?

जी हां...शबनम भी उसी गैंग का एक हिस्सा हैं. पेशे से ये एक ग्रैफिक डिजजाइनर हैं, लेकिन शौक से एक बाइकर.

दिलचस्प बात ये है कि शबनम मजबूरी में बाइक चलाना सीखा था.

21 साल पहले की उस शाम को याद करते हुए शबनम ने बताया, “एक बार मैं बस स्टैंड पर अपनी बस का इंतज़ार कर रही थी. स्टैंड पर मौजूद कुछ आदमियों ने मेरे साथ छेड़खानी शुरू कर दी और जब आस-पास खड़े लोगों से मैंने मदद मांगनी चाही, तो उन्होंने कहा कि ये आपकी समस्या है और आप ही इससे निपटिए. मैं घर आकर खूब रोई और अपने पति से कहा कि आज के बाद मैं बस में यात्रा नहीं करूंगीं. मेरे पति के पास तब इतने पैसे नहीं थे कि वे मेरे लिए गाड़ी खरीद पाते, लेकिन उनके पास बाइक थी. उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें अपनी बाइक दे सकता हूं और मैंने झट हां कर दी.”

वो दिन था और आज का दिन है, शबनम ने फिर कभी मुड़ कर नहीं देखा और अपनी आजादी को अपनी मुट्ठी में ले लिया.

राइडिंग और महिला की आज़ादी

भले ही दुनिया उनकी बाइकिंग हुनर को उनके लिंग से जोड़ कर देखती हो, लेकिन शबनम ने कभी अपने जुनून को समाज की बनाई परिभाषाओं में ढलने नहीं दिया.

उनका कहना है कि बाइकिंग का उनके स्त्री होने से कोई लेना-देना नहीं है.

बड़े ही सहज भाव में शबनम ने कहा, “मैंने मोटरसाइकिल चलाने से पहले ये नहीं सोचा था कि मैं महिला हूं या पुरुष. हां, मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं राइड कर सकती हूं, लेकिन वो इसलिए नहीं क्योंकि मैं एक महिला हूं. वो इसलिए क्योंकि आमतौर पर लोगों को बुलेट का नाम सुन कर डर जाते हैं और इसे एक अलग तरह की इज्जत देते हैं. बुलेट चलाना आखिर सबके बस की बात नहीं है.”

लेकिन हां, जब वे बुलेट का कंट्रोल अपने हाथों में लेती हैं तो उनके अंदर आजादी की एक लहर जरूर दौड़ती है.

राइडिंग के अनुभव को बयान करते हुए शबनम कहती हैं, “मेरे लिए राइडिंग का मतलब है आजादी. लेकिन जो आजादी मेरे पास है, मैं चाहती हूं कि वैसी ही आजादी भारत में ज्यादा से ज्यादा औरतों को मिले. किसी भी तरह के फैसले में एक औरत की मर्जी जरूर जुड़ी हुई होनी चाहिए. किसी और के कहने से महिलाओं को ये मान कर नहीं बैठ जाना चाहिए कि वे कुछ चीजें नहीं कर सकती या कुछ जांबाज काम केवल पुरुषों के लिए ही बने हैं.”

अपना फैसला

तेजी से बदलते वक्त के साथ पुरुष और महिलाओं की परिभाषित भूमिकाएं भी बदल रही हैं. लेकिन शायद ये सिर्फ एक शुरुआत है.

औरतों के सामाजिक औहदे पर टिप्पणी करते हुए शबनम कहती हैं, “समस्या ये है कि एक औरत को अपने हर फैसले में एक पुरुष की सहमति जरूरी लगती है. ऐसा नहीं होना चाहिए. जब तक महिलाएं अपनी मर्जी से स्वतंत्र फैसले नहीं ले पाएंगीं, तब तक समाज का चरखा यूं ही चलता रहेगा, जैसा अब तक चलता आया है.”

बदलाव की गति भले ही धीमी हो, लेकिन शबनम की बुलेट की गति फिलहाल तेज होती जा रही है.

पीछे की सीट पर बैठ कर मुझे फिलहाल बहुत मजा आ रहा है... महिला होने की वजह से मेरे आड़े अब तक सामने आई चुनौतियों के बारे में फिलहाल मैं सोचना ही नहीं चाहती.

शायद मैं समाज की पेचीदगी को पीछे छोड़ इस लम्हे की आजादी को भरपूर जी लेना चाहती हूं...शायद इसलिए क्योंकि मैं भी एक महिला हूं.