उत्तराखंड: फंसी मुख्यमंत्री की गुत्थी

उत्तराखंड
Image caption कई दिनों पहले बहुमत का दावा करने के बाद भी कांग्रेस मुख्यमंत्री का चयन नहीं कर पाई है.

उत्तराखंड में कांग्रेस ने निर्दलीय और एक क्षेत्रीय दल के समर्थन से सरकार बनाने का दावा तो पेश कर दिया लेकिन मुख्यमंत्री का चुनाव टेढ़ी खीर साबित हो रहा है.

हालांकि पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक गुलाम नबी आजाद विधायकों से सलाह-मशविरा करने के बाद शनिवार को ही दिल्ली लौट गए, जहां पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस मामले पर अंतिम फैसला लेना है लेकिन निर्णय में हो रही देरी कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रही हैं.

उत्तराखंड का अगला ममुख्यमंत्री कौन बनेगा इसको लेकर निर्दलियों के दबाव के साथ-साथ, खुद पार्टी में घमासान की स्थिति है.

कांग्रेस पार्टी के भीतर ही मुख्यमंत्री पद के लिये कम से कम छह नेता प्रमुख दावेदार बताए जाते हैं. इनमें से तीन तो सांसद - हरीश रावत,विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज, हैं.

साथ ही पार्टी टिकट पर चुने गए तीन विधायकों - हरक सिंह रावत,यशपाल आर्य और इंदिरा ह्रदयेश, का नाम भी इस सिलसिले में आने लगा है.

बगावत

सुत्रों के मुताबिक स्थिति ये है कि इनमें से जैसे ही किसी एक नाम पर सहमति बनाने की कोशिश शुरू होती है दूसरा धड़ा लगभग बगावत के शब्दों का इस्तेमाल शुरू कर देता है.

मंत्रीप्रसाद नैथानी, जिन्होंने कांग्रेस से बागी होकर निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ा और विधायक हैं, सतपाल महाराज को मुख्यमंत्री बनाने पर अड़े हुए हैं, “बाकी जिनके नाम मुख्यमंत्री के लिये चल रहे हैं उनके चरित्र और काम से जनता वाकिफ है. सिर्फ सतपाल महाराज ही हैं जिनका माफिया के साथ गठजोड़ नहीं, जो अनुभवी हैं, और ईमानदार ढंग से सरकार चलाएंगे."

राज्य में पार्टी के चुनाव प्रभारी चौधरी वीरेंद्र सिंह ने अपने बयान,”विधायकों और सांसद की बजाय मुख्यमंत्री कहीं बाहर का भी हो सकता है,” से मामले को और उलझा दिया है.

ऐसे में ये सवाल पूछा जा रहा है कि क्या 2002 अपने आपको फिर से दुहराएगा. तब नारायण दत्त तिवारी को लगभग ऊपर से थोपते हुए सत्ता की बागडोर सौंप दी गई थी.

समीकरण

क्षेत्रीय और जातीय समीकरण के अलावा कांग्रेस में इस बात पर भी गुणा-भाग हो रहा है कि किसी सांसद की बजाए क्या चुने गए विधायकों में से ही किसी को कमान सौंपना बेहतर होगा? क्योंकि सांसद को मुख्यमंत्री बनाने पर उसे विधानसभा चुनाव जिताने और दोबारा उसकी संसदीय सीट पर कब्जा करने के लिए पार्टी को फिर से दो चुनावों का सामना करना पड़ेगा.

कहा जा रहा है कि अगर हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी संसदीय सीट अस्थिर करने का खतरा नहीं मोल लेना चाहेगी तो संभवत: यशपाल आर्य और हरक सिंह रावत का पलड़ा भारी हो सकता है.

पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हरक सिंह रावत कहते हैं, "जिसे सोनिया गांधी और राहुल गांधी मुख्यमंत्री बना देंगे हम उसी की जय कर देंगे.”

लेकिन गुत्थी को चंद दिनों में ही हल करना होगा क्योंकि नई सरकार का गठन हर हाल में 15 मार्च तक हो जाना है.

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