शेरो शायरी से भरा रेल बजट

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Image caption दिनेश त्रिवेदी ने पहली बार रेल बजट पेश किया

रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने रेल बजट में शेरो शायरी का जमकर इस्तेमाल किया.

इनमें रविंद्रनाथ टैगोर की गीतांजलि से 'जहाँ न भय हो सर ऊँचा हो....' जैसी पंक्तियाँ थीं और कुछ ऐसी पंक्तियाँ जो उन्होंने बजट बनाने के दौरान या तो खुद लिखीं थीं या फिर किसी ने सुझाईं थीं. तो 'जान है तो जहान' है जैसी कुछ पंक्तियाँ भी.

बजट की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय रेलवे जैसा कोई दूसरा संगठन दुनिया में नहीं है. उन्होंने इस विशाल संगठन को सुचारु रूप से चलाने के लिए रेलवे बोर्ड के अधिकारियों से लेकर गैंगमैन तक सभी कर्मचारियों का आभार कुछ इस तरह जताया,

अब तक की कामयाबियाँ तुम्हारे नाम करता हूँहरेक की लगन को झुक कर सलाम करता हूँ

रेलवे की ओर से अपनी बेहतरी के लिए किए जाने वाले प्रयासों का ज़िक्र करने से पहले उन्होंने ये शेर पढ़ा

हाथ की लकीरों से ज़िंदगी नहीं बनती अज़्महमारा भी कुछ हिस्सा है ज़िंदगी बनाने में

हर किसी के लिए रेलवे का महत्व बताने के लिए उन्होंने कहा कि जैसे हिमालय के बिना देश की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी तरह से भारतीय रेल के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती और उन्होंने ये पंक्तियाँ पढ़ीं,

देश की रगों में दौड़ती है रेलदेश के हर अंग को जोड़ती है रेलघर्म, जाति-पाति को नहीं जानती रेलछोड़े बड़े सभी को अपना मानती है रेल

पीर पंजाल के पहाड़ों पर 11 किलोमीटर की सुरंग का काम पूरा करने पर रेलवे की पीठ थपथपाते हुए उन्होंने कहा कि कश्मीर को देश से जोड़ने वाली ये सुरंग देश की सबसे बड़ी सुरंग होगी,

फ़ौलादी हैं सीने अपने फ़ौलादी हैं बाहेंहम चाहें तो पैदा कर दें चट्टानों में राहें

वित्तीय संकट झेल रहे रेलवे को अब कर्ज़ लेना पड़ रहा है. इसकी चर्चा करते हुए उन्होंने दिलासा देते हुए कहा,

मंज़िल अभी दूर और रास्ता जटिल हैकंघा मिलाकर साथ चलें तो कुछ मुश्कल नहीं हैसाथ मिलकर जो हम पटरियाँ बिछाएँगेतो देखते ही देखते सब रास्ते खुल जाएँगे

रेलवे की खस्ता हाल की चर्चा करते हुए उन्होंने संसद का समर्थन मांगते हुए ये पंक्तियाँ पढ़ीं,

कंधे झुक गए हैं, कमर लचक गई हैबोझा उठा उठाकर बेचारी रेल थक गई हैरेल को नई दवा, नया असर चाहिएइस सफ़र में मुझको आपको आपका हमसफ़र चाहिए

और भाषण ख़त्म करते हुए उन्होंने ये पंक्तियाँ पढ़ीं,

रेलगाड़ी की छुकछुक में हीआम आदमी की धक-धक है.रेलगाड़ी की बरक्कत में हीदेश की बरकत है.रेलगाड़ी को थोड़ी दुलार की ज़रुरत है,थोड़ी राहत, थो़ड़ी चाहत, थोड़े प्यार की ज़रुरत है.रेलगाड़ी की छुक-छुक में हीआम आदमी की धक-धक है.

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