'सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा हैं भारत में समलैंगिंक'

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Image caption सरकार के मुताबिक देश में समलैंगिंकों की संख्या करीब 25 लाख है

भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि देश भर में समलैंगिकों की संख्या करीब 25 लाख है और इनमें से करीब सात प्रतिशत लोग एचआईवी से संक्रमित हैं.

लेकिन सवाल उठता है कि ये गणना कैसे की गई और क्या वास्तव में देश में 25 लाख समलैंगिंक हैं.

समलैंगिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाली एक संस्था 'अधिकार' से जुड़े अधिवक्ता आदित्य बंद्योपाध्याय कहते हैं, “सरकार ने दरअसल जो आंकड़े सुप्रीम कोर्ट को दिए हैं, वो उन लोगों की संख्या है जो समलैंगिंक हैं और जिन्हें एचआईवी होने की आशंका बहुत ज्यादा है.”

आदित्य बंद्योपाध्याय कहते हैं कि सरकार का समलैंगिंकों की गणना करने का जो मापदंड है, उसके अनुसार भी ये संख्या करीब पंद्रह गुना ज्यादा होती है.

उनके मुताबिक, इस हिसाब से देखा जाए तो देश भर में समलैंगिंकों की संख्या लगभग पांच करोड़ के आस-पास ठहरती है.

सरकार ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के आंकड़ों के आधार पर उच्चतम न्यायालय में दायर अपने हलफनामे में कहा है कि पुरुषों से सेक्स करने वाले पुरुषों की संख्या भारत में अनुमानत: 25 लाख है.

हलफनामे में कहा गया है कि एड्स नियंत्रण विभाग पुरुषों से सेक्स संबंध रखने वाले ऐसे चार लाख पुरुषों को अपने एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तहत लाने की योजना बना रहा है जिन्हें एचआईवी से ज्यादा खतरा है.

एचआईवी संक्रमण

हलफनामे में यह भी कहा गया है कि समलैंगिंकों में एचआईवी संक्रमित लोगों की संख्या सेक्स वर्करों से भी ज्यादा है.

इसके मुताबिक महिला सेक्स वर्करों में एचआईवी पीड़ितों की संख्या 4.60 से 4.94 प्रतिशत है जबकि पुरुषों से सेक्स करने वाले पुरुषों में यह 6.54 से 7.23 प्रतिशत है.

इसके अलावा इंजेक्शन से मादक पदार्थ का सेवन करने वालों में यह 9.42 से 10.30 प्रतिशत है.

सरकार से ये आंकड़े सुप्रीम कोर्ट ने गत 29 फरवरी को इस मामले में हुई सुनवाई के दौरान मांगे थे.

आंकड़ों पर सवाल

लेकिन जिस देश में कुछ समय पहले तक समलैंगिकता को अपराध माना जाता था, वहां इनकी सही संख्या के बारे में कोई भी जानकारी कितनी प्रमाणिक होगी, ये कहना मुश्किल है.

इस बारे में जब बीबीसी ने एचआईवी-एड्स पर काम करने वाली ग़ैरसरकारी संस्था नाज़ की निदेशक, अंजलि गोपालन से पूछा तो उन्होंने इस मुद्दे पर कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया. उनका कहना था कि ये मामला अदालत के विचाराधीन है, इसलिए कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने गत 29 फरवरी को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से कहा था कि उसे देश में समलैंगिकों की संख्या और उनमें से एचआईवी से संक्रमित लोगों की संख्या के बारे में जानकारी दी जाए.

इस बारे में नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एलजीटीबी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शयूल और ट्रांसजेंडर) लोगों के बारे में सभी प्रासंगिक रिकॉर्ड देने के लिए भी कहा था.

गौरतलब है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2009 में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाने का फ़ैसला किया था. इसके ख़िलाफ़ विभिन्न संगठनों की याचिकाओं पर फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है.

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