"तेरी जात तो चोर है"

पारधी समुदाय के लोग
Image caption पारधी समुदाय के लोगों को प्रशासन से लेकर आम लोगों तक से भेदभाव का सामना करना पड़ता है

सड़कों के किनारे तमाशा दिखा कर अपना पेट पालने वाले बैतूल में रह रहे बंजारे अपने माथे पर एक कलंक लेकर जी रहे हैं. यह कलंक उन्हें इतिहास ने दिया है.

ब्रितानी हुकूमत के दौरान बहुत सारी ऐसी लड़ाकू जनजातियाँ थीं जिन्हें क्रिमिनल ट्राइब्स यानी आपराधिक जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया था. अंग्रेजी हुकूमत ने वर्ष 1871 में एक नए कानून 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' को लागू किया. इस कानून के दायरे में लगभग 500 जनजातियों को लाया गया.

भारत आजाद हुआ और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की पहल पर 1952 में इन जनजातियों को विमुक्त कर दिया गया. मगर इसके बावजूद आज भी इन जनजातियों को अपने माथे का कलंक ढोना पढ़ रहा है.

आज यह आपराधिक जनजाति तो नहीं कहलातीं है मगर आज इन्हें विमुक्त जनजाति के नाम से जाना जाता है.

चूँकि इनके साथ यह कलंक लगा हुआ है इसलिए समाज ने कभी भी इन्हें स्वीकार नहीं किया. ना समाज ने और ना ही सरकार ने.

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में एक ऐसी ही विमुक्त जनजाति है पारधी जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. 2007 में इनके आशियानों को सरेआम फूँका गया. इन पर हमला किया गया. मगर पांच सालों के बाद भी आज तक इन्हें इंसाफ नहीं मिल पाया है.

आज वे बैतूल शहर के बीच में टूटी हुई झोपड़ियों में रहते हैं और भीख मांगकर गुज़ारा करते हैं.

पारधियों की बस्ती में रहने वाले बच्चे हों या बूढ़े, सब एक वक्त का खाना ही खाते हैं. दिन भर भीख मांगते हैं और जो कुछ जमा होता है आपस में बाँटकर रात को खाते हैं. फिर अपनी टूटी-फूटी झोपड़ियों में रात गुज़ारकर सुबह होने का इंतज़ार करते हैं.

'प्रशासन का अत्याचार'

Image caption पारधी समाज के मुखिया अलिसिया प्रशासन पर आरोप लगाते हैं

पारधी समाज के मुखिया अलिसिया पारधी उस पल को याद कर सिहर जाते हैं जब उनके घरों को प्रशासन की मौजूदगी में नेस्तोनाबूद कर दिया गया था. वह कहते हैं मुलताई में चौथाई बस्ती में वह रहा करते थे. 2007 में पास में ही किसी की हत्या हुई जिसके बाद जिसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों, स्थानीय नेताओं और पुलिस का गुस्सा बस्ती पर टूट पड़ा.

अलिसिया कहते हैं, "हत्या महाराष्ट्र से आए पारधियों ने की. हत्या के चश्मदीद ने भी इसकी पुष्टि की. मगर किसी ने हमारी एक ना सुनी. पुलिस और प्रशासन के लोग आए. पूरी बस्ती के लोगों को इकठ्ठा कर थाने ले गए और इलाका छोड़ने का निर्देश दिया."

वह बताते हैं, "दो दिनों के बाद हम वापस आए तो बुलडोज़र लगाकर हमारे आशियानों को ढाह दिया गया. घरों में आग लगा दी गई. हमें मारा पीटा गया और हमारी महिलाओं के साथ ज्यादती की गयी."

अलिसिया का आरोप है कि यह सब कुछ प्रशासन की देख-रेख में हुआ और इस वारदात को अंजाम देने वालों में स्थानीय नेता भी शामिल थे जो प्रमुख राजनीतिक दलों के सदस्य भी हैं.

बाद में एक सामाजिक संगठन - समाजवादी जन परिषद की पहल पर उच्च न्यायालय में मामला दायर किया गया.

न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पूरी घटना की जांच के आदेश दे दिए. जांच का ज़िम्मा केंद्रीय जाँच ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंपा गया. दो साल से सीबीआई मामले की जांच कर रही है मगर आज तक इसमें किसी की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है.

'विमुक्त का कलंक'

परिषद के अनुराग मोदी कहते हैं, "विद्रोही किसी को पसंद नहीं आता. और यह जातियां शुरू से ही विद्रोही थीं क्योंकि इन्होंने महाराणा प्रताप का साथ दिया मुग़लों के खिलाफ. बाद में यह अंग्रेजों का खजाना लूटने का काम करती थीं."

Image caption मोदी भी समाज के नज़रिए को दोषी बताते हैं

मोदी के मुताबिक़, "जिन जनजातियों को अंग्रेजों ने आपराधिक घोषित किया था उन्हें 1952 में विमुक्त तो कर दिया गया मगर उनके नाम के आगे विमुक्त का शब्द जुड़ गया जिससे पता चले कि यह पहले अपराधी जनजाति के थे. मतलब अब तुम चोर नहीं हो, पहले चोर थे. यही नजरिया समाज का भी है और प्रशासन का."

दो साल से चल रही सीबीआई की जांच से भी पारधियों को निराशा ही हाथ लगी. अनुराग मोदी कहते हैं कि सीबीआई ने उच्च न्यायलय में हलफनामा दायर कर कहा है कि उसने पारधियों पर हमले के सिलसिले में 75 लोगों की शिनाख्त कर ली है.

मगर उनका कहना है कि इन 75 लोगों में से सिर्फ एक को ही गिरफ्तार किया गया है. समाजवादी जन परिषद का आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि बाकी के अभियुक्तों को संकेत मिले कि वह अपनी ज़मानत करवा लें.

मोदी और पारधियों का आरोप है कि सीबीआई के अधिकारियों नें भी कई बार उन पर दबाव डाला कि वह नेताओं के नाम मामले से हटा लें.

पत्रकारों की गवाही

मगर इस घटना के अभियुक्तों के लिए सबसे चिंता वाली बात है की पारधियों की बस्ती में की जा रही आगज़नी की वारदात वीडियो कैमरों में क़ैद हो गई.

घटना स्थल पर मौजूद कुछ पत्रकारों ने वारदात की वीडियो रिकार्डिंग सीबीआई को सौंप दी है. मामले के चश्मदीद पत्रकार रिशु कुमार नायडू कहते हैं कि जो सबूत उन्होंने जांच एजेंसी को दिए हैं वह काफी हैं.

इतना ही नहीं कई और पत्रकारों नें बतौर गवाह सीबीआई के समक्ष अपने बयान दर्ज करवाए हैं जिसमे उन्होंने उन नेताओं और अधिकारियों की पहचान की है जो खड़े होकर पारधियों के घरों को जला रहे थे.

भारत के विमुक्त जनजाति आयोग के अध्यक्ष बालकृष्ण सिद्धराम रेंके मानते हैं कि इन जनजाति के प्रति लोगों की मानसिकता को बदलना ही सबसे अहम क़दम होगा.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने जिन्हें सूचीबद्ध किया था उन्हें आजादी के बाद असूचीबद्ध कर दिया गया है.

वह कहते हैं, "सिर्फ इतना ही हुआ है. जबकि कानून की किताबों में आज भी इन्हें इसी रूप में देखा जाता है. प्रशासन के दिमाग में बैठा है कि यह लोग बुरे हैं. इन्हें समाज से अलग रखना चाहिए. इस मानसिकता को जब तक बदला नहीं जाएगा तब तक पारधियों का कुछ भी भला नहीं हो सकता है."

भारत में आज जनता का राज है मगर विमुक्त की गई जनजातियों के लोग आज भी ब्रितानी सरकार द्वारा दिए गए कलंक को लेकर जीने को मजबूर हैं. इनमें कुछ जनजातियाँ ऐसी हैं जो बंजारे हैं और जो सड़कों के किनारे तमाशा दिखाकर पेट पालते हैं वहीं कुछ ऐसे हैं जिनके पास आजीविका के लिए कोई साधन नहीं है.

ना पहचान ना घर. अलबत्ता इनके माथे पर आज भी लिखा हुआ है- "तेरी जात चोर है".

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