'रेलवे तो ऐसे ही घाटे में चलती रहेगी'

रेल बजट
Image caption रेल पर कई तरह के छूट देने का दबाव होता है

लोकसभा में बुधवार को पेश किया गया रेल बजट राजनीतिक विवाद की भेंट चढ़ गया.

रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने यात्री भाड़ा बढ़ाने की घोषणा के बाद जैसे ही अपना भाषण खत्म किया, विपक्ष तो विपक्ष खुद उनकी पार्टी के नेता उन पर टूट पड़े.

दिनेश त्रिवेदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने भी एक सार्वजनिक मंच से घोषणा कर दी की भाड़ा बढ़ने नहीं दिया जाएगा.

आनन फानन में त्रिवेदी विभिन्न छोटे-बड़े चैनलों के संपादकों के सामने जवाब अपनी सफाई रखने के लिए बैठना पड़ा.

रेलवे का किराया पिछले आठ सालों में नहीं बढ़ा. अगर गौर से देखा जाए तो रेलवे का यात्री किराया खर्च बढ़ने के अनुपात में कम ही बढ़ा है, इसे और ज्यादा ही बढ़ना चाहिए था.

राजनीतिक कारणों से रेलवे पर जनता को कई तरह के छूट देने का भी दबाव होता है. कम भाड़ा और सीमित सरकारी मदद के बाद रेलवे से पर्याप्त सुरक्षा और सुविधा देने की अपेक्षा रखी जाती है.

'सुरक्षा के लिए पूंजी चाहिए'

सुरक्षा की बात करें तो रेलवे के आधुनिकरण के लिए बड़ी पूंजी चाहिए होती है और जब तक कोई सुरक्षा प्रणाली का प्रयोग होना शुरू होता है तब तक वो तकनीक पुराना हो जाता है, इसलिए सुरक्षा में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो पाता है.

जनता को सबसे ज्यादा परेशानी टिकटों की कालाबाजारी से होती है.

कालाबाजारी में सबकी मिलीभगत होती है. एक उदाहरण के तौर पर देखे तो वीआईपी कोटा का संचालन करने वाले सरकारी बाबू तक महंगे होटलों में खाना खाते है. उन्हे बेहतरीन महंगे तोहफे मिलते है, उनके जैसी ऐश से अफसर भी नहीं रहते.

पकड़े जाने पर कालाबाजारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई तक नहीं की जाती है, सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए आरपीएफ कालाबाजारियों को पकड़ती है और फिर पब्लिसिटी होने के बाद छोड़ देती है.

आज जो बजट पेश हुआ है, उससे कागजी उम्मीद जगाने की कोशिश की गई है. हमारे काम-काज का तरीका पश्चिमी देशों जैसा नही है इसलिए लोगों को झांसा देने की कोशिश जारी रहेगी. मुफ्त सेवाओं का बोझ ढो रही रेलवे घाटे पर ही चलता रहेगा

(बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी से बातचीत पर आधारित)

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