असली पतंगबाज उल्टी हवा में पतंग उड़ाते हैं: विजय बहुगुणा

Image caption विजय बहुगुणा कहते हैं कि पतंग तो सभी उड़ाते हैं लेकिन असली पतंगबाज वो है जो उलटी हवा में पतंग उड़ाए

बगावत के सुरों और अस्थिरता के बीच विजय बहुगुणा ने उत्तराखंड के सातवें मुख्यमंत्री के तौर पर कामकाज संभाल लिया.

सचिवालय जाकर उन्होंने सबसे पहले राज्य की वित्तीय हालत की जांच करने की बात कही. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि वो अपनी सरकार का बहुमत कब और कैसे साबित कर पाते हैं.

ढोल-नगाड़े और जश्नोगुबार के बीच बहुगुणा बुधवार को पार्टी के दफ्तर पंहुचे और अपने हाव-भाव से आश्वस्त करने की कोशिश की. उत्साही कार्यकर्ताओं की भीड़ ने उन्हें घेर लिया जिनसे पीछा छुड़ाने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी.

आखिरकार वो पार्टी दफ्तर की छत पर चढ़ने में कामयाब हुए और वहीं से हाथ हिलाकर अपने समर्थकों का शुक्रिया अदा किया.

'पतंगबाज' बहुगुणा

इसी आपाधापी के बीच उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार आसानी से बहुमत साबित कर देगी, उन्होंने कहा, ''पतंग तो सभी उड़ाते हैं लेकिन असली पतंगबाज वो है जो उलटी हवा में पतंग उड़ाए. निर्दलीय और बीएसपी के विधायक हमारे साथ हैं और हमें कोई कठिनाई नहीं आएगी.''

हरीश रावत की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कॉंग्रेस की परंपरा की दुहाई देते हुए कहा कि वो बीजेपी के साथ हाथ मिलाने की गलती नहीं करेंगे.

उन्होंने कहा, ''जो भी हमारे नेता हैं चाहे वो रूठे हुए हों या प्रसन्न, हम सभी ने पूरे राजनैतिक जीवन में सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ संघर्ष किया है और हम कभी भी उनके साथ नहीं जा सकते.''

उधर हरीश रावत खेमा बगावत पर अड़ा हुआ है. देहरादून में कॉंग्रेस के प्रवक्ता और हरीश रावत के करीबी सुरेंद्र अग्रवाल ने कहा, ''स्थिति वही बनी हुई है. विजय बहुगुणा हमें स्वीकार नहीं हैं.''

मान-मनौवल

Image caption हरीश रावत का विरोधी खेमा विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री मानने को तैयार नहीं है

कॉंग्रेस सूत्रों के अनुसार मान-मनौवल चल रही है और दोनों ही पक्षों की तरफ से समझौते के कई फार्मूलों पर विचार हो रहा है.

विजय बहुगुणा की सरकार सदन में अपना बहुमत साबित कर पाएगी या नहीं, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि हरीश रावत खेमा आर-पार की लडाई लड़ता है या दबाव की राजनीति तक सीमित रहकर किसी फार्मूले पर राजी हो जाता है.

वर्तमान हालात में दूसरी संभावना ज्यादा प्रबल नजर आती है जिसके दो कारण हैं.

अगर राजनीतिक अंकों का आंकड़ा देखें तो उत्तराखंड की 70 सदस्यीय विधानसभा में कॉंग्रेस ने 32 सीटें हासिल की हैं. हरीश रावत खेमा सिर्फ 17 विधायकों के साथ होने का दावा कर रहा है जबकि दलबदल कानून के अनुसार पार्टी तोड़कर नए दल के गठन के लिये कम से कम 22 विधायक चाहिये.

अगर बाकी विधायकों की निष्ठा आलाकमान के फैसले से जुड़ी रहती है तो ये कदम उठाना आसान नहीं है.

बीजेपी की कोशिश

दूसरा, अगर राजनैतिक दांव-पेंच के लिहाज से देखें तो बीजेपी के साथ हाथ मिलाना बहुत अनुकूल नहीं हो सकता है क्योंकि बीजेपी के अंदरखाने खुद ही भारी खेमेबाजी है जिससे मुख्यमंत्री और मंत्री पदों के लिये बंदरबांट की स्थिति हो सकती है.

बीजेपी ऊपरी तौर पर कॉंग्रेस के इस कलह का लाभ उठाने का दावा जरूर कर रही है, मगर वहां भी पार्टी के विधायक दल का नेता अब तक नहीं चुना जा सका है. इस पद के लिये खंडूरी और कोश्यारी की जोड़ी रानीखेत से विधायक अजय भट्ट को लेकर निशंक के सामने है.

बहरहाल विजय बहुगुणा को हर हाल में 31 मार्च के पहले बहुमत साबित करना है क्योंकि उसके बिना बजट नहीं पेश किया जा सकता.

क्या बहुगुणा केंद्र में चरण सिंह या वाजपेयी की 13 दिन की सरकार का इतिहास दोहराएंगे? ये सवाल देहरादून से दिल्ली तक सबको परेशान कर रहा है. आशंका और अस्थिरता के इस माहौल से बाहर आने का एक ही तरीका है कि जल्द से जल्द विधानसभा का सत्र बुलाकर बहुगुणा अपना बहुमत साबित कर दें.

ये उनकी भी इच्छा होगी लेकिन शायद यही उनकी सबसे बड़ी परीक्षा भी होगी. फिलहाल उनके लिये राहत यही है कि इस परीक्षा में हाईकमान उनके साथ है.

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