अखिलेश की ताजपोशी और अव्यवस्था

अखिलेश यादव (फाइल फोटो) इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption अखिलेश यादव मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए.

किसी उफनायी नदी ने जैसे तटबंध तोड़ दिया हो और बाढ़ का पानी अपनी लहरों से सब कुछ उलट-पुलट दे, कुछ वैसा ही दृश्य था अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण समारोह और उसके बाद मुख्यमंत्री बंगले के सामने कालिदास मार्ग का.

समाजवादी पार्टी के कार्यालय प्रभारी एसआरएस यादव झुंझला कर मंच से बार-बार माइक पर घोषणा कर रहें थे कि कार्यकर्ता लोग मनोनीत मंत्रियों की कुर्सियां खाली कर दें और मंच के पीछे से हट जाएँ, लेकिन कोई उनकी बात नही मान रहा था.

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव अपने बेटे की ताजपोशी देखने के लिए मंच के सामने ही बैठे थे और सभी लोग उन्हें बधाई देनी की होड़ में थे.

जया बच्चन से लेकर सुब्रत रॉय तक सभी इसी माहौल में धक्के खाते इधर-उधर कहीं बैठने की जगह ढूंढ रहें थे.

अखिलेश यादव शपथ ग्रहण के लिए निर्धारित समय से करीब आधा घंटा पहले आए. उन्होंने मंच से हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया और वह वो भी चारों तरफ भीड़ और अव्यवस्था देखकर भौंचक्का हो गए.

एसआरएस यादव ने उनसे अनुरोध किया कि वह कार्यकर्ताओं से व्यवस्था बनाने की अपील करे दें. लेकिन झुंझलाते हुए अखिलेश ने मना कर दिया और अपनी कुर्सी पर बैठ गए.

इसी बीच मुख्य चुनाव अधिकारी उमेश सिन्हा अपनी टीम के साथ आते हैं लेकिन अधिकारी दीर्घा की ओर जाने की कोई गुंजाइश न देख वह मीडिया गैलरी में घुसे जहाँ पहले ही अनेक दूसरे लोग कब्ज़ा जमाए बैठे थे.

खैर राज्यपाल बीएल जोशी ठीक साढ़े ग्यारह बजे पहुंच गए. राष्ट्रगान हुआ. उसके बाद मुख्यमंत्री और दूसरे मंत्रियों को शपथ दिलाई गई.

समारोह समाप्त कर जैसे ही राज्यपाल और मुख्यमंत्री मंच से उतरे सामाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं का हुजूम मंच पर चढ गया. ये लोग मंच पर लगी फूलों की मालाएं नोचकर फेंकने लगे. एक कार्यकर्ता तो उस मेज पर नाचने लगा जो गवर्नर के सामने रखी थी. मेज टूट गई. लोग जो कुछ मिल रहा था नोचकर ले जा रहें थे यहाँ तक कि एक कार्यकर्ता कुर्सी उठाकर भी ले जाता दिखाई दिया.

शिक्षक और कई दूसरे संगठन बाकायदा तैयारी से अपने बैनर लेकर आए थे और वह मंच से लहराकर टी वी कैमरों को दिखा रहें थे.

शायद वे इस बात का जश्न मना रहें थे कि यह सरकार उनके सहयोग और समर्थन से बनी है, इसलिए मुख्यमंत्री के पास तक आना उनका अधिकार है.

माया सरकार में कालिदास मार्ग तो क्या किसी सड़क पर जुलुस और विरोध प्रदर्शन की अनुमति नही थी, सिवाए गोमती किनारे निर्धारित स्थान के.

Image caption मुख्यमंत्री निवास पर प्रदर्शन करते हुए परीक्षार्थी

भारी अव्यवस्था और अफरा-तफरी में मुलायम सिंह यादव के समधी और टाइम्स ऑफ इंडिया के सीनियर पत्रकार अरविन्द सिंह बिष्ट का पर्स चोरी हो गया. पर्स में दस हजार रूपए और एटीएम कार्ड था.

कालिदास मार्ग बना जनता मार्ग

गोंडा जिले के कटरा बाजार से आए जहीर अहमद और अजमत उल्ला आपस में बतिया रहें थे. मायावती सरकार में तो इधर देख भी नही सकते थे.

इन दोनों युवकों का कहना था, “वे अखिलेश भैया के एकदम क़रीब तक पहुँच गए थे.”

लेकिन इन दोनों का कहना था कि इस समय शासन बिलकुल लचर और ढीला हो गया है. दोनों चाहते हैं कि अखिलेश यादव जल्दी से जल्दी सरकार संभालें और नौजवानों को रोजगार दिलाएं.

एक महिला आई ओर बोली कि मायावती और मुलायम में यही तो फर्क है. मुलायम एकदम जनता के आदमी हैं.

भीड़ और अव्यवस्था के भय से अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस सचिवालय मीडिया सेंटर के बजाय पांच कालिदास मार्ग मुख्यमंत्री बंगले के सभागार में बुलाई. हालांकि अभी उन्होंने गृह प्रवेश नही किया है.

पांच साल बाद पहली बार मीडिया वाले मुख्य द्वार से बंगले के अंदर गया, हालाकि यहाँ भी पुलिस वाले पत्रकारों की भारी भीड़ से परेशान थे. मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव उस संकरे गेट से अंदर गए जिससे पहले पत्रकार आते जाते थे.

मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहली पहली प्रेस कांफ्रेंस में अखिलेश यादव ने कहा, “पार्टी कार्यकर्ता लोकतंत्र की वापसी की खुशी मना रहें थे. पहले बहुत सारी पाबंदियां थीं. आज आजाद हो गए.”

मायावती प्रेस कांफ्रेंस में कुर्सी पर अकेले बैठती थीं. अखिलेश ने अपनी पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी को साथ में बिठाया. पत्रकारों ने राजेन्द्र चौधरी को बधाई दी तो अखिलेश ने शिकायत की, “आप लोगों ने मुझे तो दी नही बधाई.”

लेकिन प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव उस समय एक दम असहज हो गए जब एक पत्रकार ने राजा भैया को मंत्री बनाने के बारे में पूछा.

अखिलेश ने सफाई दी कि उनके ऊपर मुक़दमे पिछली सरकार ने कायम किए थे.

प्रेस कांफ्रेंस करके मैं जब बाहर आया तो देखा कि बंगले के मुख्य द्वार पर शिक्षक चयन पात्रता परीक्षा निरस्त होने से नाराज करीब सौ युवक मुख्यमंत्री बंगले के मुख्य गेट पर धरना दे रहे थे और पुलिस वाले हाथ जोड़े खड़े थे. बड़ी मुश्किल से पुलिस वालों ने उनका धरना खत्म कराया.

वहीं भीड़ में काला चश्मा लगाए एक बुजुर्ग असलम मिले. आजमगढ़ के रहने वाले नेत्रहीन असलम गायक हैं. असलम समाजवादी पार्टी के प्रचार गीत गाते हैं. उनके तीन बच्चे हैं, लेकिन रहने को घर नही. गायक असलम ने अखिलेश प्रशंसा में एक गीत सुनाया.

असलम भी इस उम्मीद से लखनऊ आए हैं कि मुलायम का बेटा उनकी भी सुध लेगा.

Image caption मुख्यमंत्री निवास के पास से होकर गुजरता हुआ एक रिक्शा

अब तक बड़ी बड़ी गाडियां जा चुकी थीं और कालिदास मार्ग करीब-करीब खाली हो चुका था.

देखा उधर से एक रिक्शे पर तीन सवारियां बैठी हैं. रिक्शे पर दूध भरा डिब्बा भी है. रिक्शा बस मुख्यमंत्री बंगले के बाहर बने बैरियर पर पहुंचा ही था कि कई पुलिस वालों ने उसे घेर लिया.

पुलिस वालों ने रिक्शे वाले और सवारियों को हड़का कर वापस किया. ''जानते नही हो मुख्यमंत्री बँगला है कोई आम रास्ता नही.''

रिक्शा वाला लौट गया. मगर उधर से उसके पीछे एक और रिक्शा आ गया. इस पर कोई पुराने समाजवादी नेता बैठे थे.

वह पुलिस वाले से बहस कर रहें थे, ''कैसे नही जा सकता रिक्शा इधर से.''

मुझे देर हो रही थी, खबर लिखने की, सो मै पुलिस और समाजवादी नेता की बहस से अपने को वंचित कर चला आया.

शायद पुलिस वाले अभी मुख्यमंत्री बंगले की पुरानी हनक में ही हैं. निजाम बदलने और समाजवादियों के सत्ता में वापस आने का एहसास अभी नही हुआ. मंच टूटने पर भी नही.

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