कांटों से भरी डगर है यूपीए की......

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Image caption प्रधानमंत्री के लिए अगले दो साल सरकार चलाना और कठिन हो गया है.

जब किसी सरकार का मुखिया बार बार कहे कि सरकार खतरे में नहीं है, सरकार बिल्कुल सुरक्षित है तो ये समझना चाहिए कि सरकार खतरे में न सही लेकिन खतरे के निशान के आसपास तो ज़रुर है.

अगर फिर भी यकीन न हो तो अख़बार पलटे जाएं जो रेल बजट से अधिक इन खबरों से पटे हुए हैं कि कांग्रेस संकट के दौर में है और नए सहयोगियों की तलाश कर रही है.

साफ है यूपीए का ध्यान रेल बजट और बजट से अधिक सरकार बचाने पर है. ऐसे में अगले दो साल तक कांग्रेस के लिए सरकार चलाना हिमालय फतह करने जैसा ही दिखता है.

हिंदू की पहली खबर में ही है कांग्रेस नए सहयोगियों की तलाश में और टाइम्स ऑफ इंडिया लिखता है कांग्रेस ने नए सहयोगियों की तलाश तेज की.

एक्सप्रेस कहता है कांग्रेस को सपा से मदद की उम्मीद. फिर भी अगर कोई सोचता है कि यूपीए सरकार मज़े से कार्यकाल पूरा करेगी तो वो अंधेरे में है.

साफ है दिनेश त्रिवेदी का जाना तय है. यह पहली बार ही होगा कि किसी रेल मंत्री को बजट में किराया बढ़ाने के कारण पद छोड़ना पड़ रहा है.

वैसे तो यूपीए के कार्यकाल में कई ऐतिहासिक बातें हुई हैं लेकिन इसमें ये भी एक आश्चर्यजनक उपलब्धि होगी कि रेल बजट पेश एक रेलमंत्री करेगा और शायद इसका बचाव कोई दूसरा रेलमंत्री करे.

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Image caption मुकुल राय के नए रेल मंत्री बनने के आसार. ये वही मुकुल राय हैं जो ट्रेन दुर्घटना के बाद घटनास्थल पर नहीं गए थे ये कहते हुए कि ये काम अधिकारियों का है

मजे की बात ये है कि रेल किरायों में बढ़ोतरी का विरोध रेलमंत्री की पार्टी ही कर रही है मानो पार्टी को रेलमंत्री के इरादों का पता ही न हो.

वैसे देखने वाली बात ये भी है कि किसी भी विशेषज्ञ ने किरायों में आठ साल बाद की गई मामूली बढ़ोतरी की आलोचना नहीं की है.रेलयात्रियों में भी इस बढ़ोतरी को लेकर बहुत अधिक आक्रोश नहीं है.

खैर यूपीए के पहले कार्यकाल या यूपीए वन वाम दलों के ब्लैकमेल का शिकार होती रही और यूपीए टू ममता बनर्जी के रवैये से परेशान दिखती है.

लेकिन ममता बनर्जी शायद गरीबों की चैपियन हैं. वो केंद्र की राजनीति को पश्चिम बंगाल की राजनीति की तरह चलाना चाहती हैं जहां बात बात पर बंद और विरोध आम है.

चाहे रेल बजट हो या इससे पहले पेट्रोल-डीजल के किरायों में बढ़ोतरी, तृणमूल सत्ता में रहते हुए सरकार का विरोध करती रही. पार्टी न तो समर्थन वापस लेती है और न ही विरोध बंद करती है यानी दोनों हाथ में लड्डू.

डीएमके भी कुछ मुद्दों पर सरकार को परेशान कर चुकी है लेकिन राज्य में सत्ता में न होने के कारण पार्टी टू जी घोटाला में अपने वरिष्ठ सांसदों को गिरफ्तार होने से रोक नहीं पाई. इस समय डीएमके श्रीलंका में तमिलों के समर्थन में अमरीकी प्रस्ताव पर भारत सरकार का समर्थन चाहती है.

फिलहाल लोकसभा चुनावों में दो साल बाकी है. सरकार को दो बजट और पेश करने हैं लेकिन सरकार का सारा समय जोड़ तोड़ करने में ही बीतता लगता है.

कभी मुलायम, कभी ममता तो कभी द्रमुक. प्रधानमंत्री देश के लिए सोचने की बजाय अपनी कैबिनेट से ही जूझते हुए से लगते हैं.

रेल बजट के गड़बड़झाले के बाद लगता नहीं है कि आम बजट में भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कोई साहसिक कदम उठाया जाएगा. क्या पता बजट के किसी मुद्दे पर तृणमूल समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दे तो सरकार बजट का बचाव करे या फिर बहुमत का.

अगर रेल बजट और आम बजट पारित हो भी जाए तो भी आने वाले दिन यूपीए के लिए कष्ट भरे प्रतीत होते हैं. आला अधिकारी और कई दिग्गज नेता कह चुके हैं कि उन्हें इस बात का कम भरोसा है कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी.

पाँच राज्यों के परिणामों के बाद छोटे दल वैसे भी अपनी तलवारें भांजने में लगे हैं. बयानबाज़ी और समर्थन के लेन देन का बाज़ार गर्म हो चुका है.

यूपीए का यह कार्यकाल भ्रष्टाचार, सहयोगी दलों के ब्लैकमेल और कांग्रेस पार्टी की गिरती साख के अलावा क्षेत्रीय दलों के बदलते समीकरणों के लिए याद किया जाएगा.

लेकिन उससे भी बढ़कर इस कार्यकाल को निष्क्रियता का कार्यकाल माना जाएगा जहां किसी न किसी कारण से सरकार फ़ैसले लेने से घबराती रही और हाथ बंधे होने का हवाला देती रही.

सहयोगी दलों की रेलमपेल में पढ़े लिखे प्रधानमंत्री मौन न रहें तो क्या करें और फिर लोग उन्हें मनमोहन की जगह मौन-मोहन की संज्ञा दे दें तो इसमें बुरा ही क्या है.

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