दिल्ली के स्कूलों में कम मुसलमान बच्चे?

स्कूल (फाइल फोटो) इमेज कॉपीरइट aser
Image caption दिल्ली के कई स्कूलों ने आँकड़े जारी नहीं किए हैं

दिल्ली के जाकिर नगर में रहने वाले खालिद हाशमी अपने बेटे के स्कूल में दाखिले को लेकर काफी चिंतित हैं. अपने तीन साल से कुछ अधिक उम्र के बेटे के नर्सरी में दाखिले के लिए उन्होंने 10 प्राइवेट स्कूलों में फार्म भरा. लेकिन इन में से किसी में भी उनके बेटे का नाम नहीं आया.

उनका कहना है, ''यह समस्या केवल मेरी नहीं है. बहुत सारे मुसलमान बच्चों का यही हाल है. जाकिर बाग में रहने वाले मेरे एक दोस्त ने 16 स्कूलों में आवेदन किया था लेकिन उनका भी कहीं नाम नहीं आया है.''

पेशे से साफ्टवेयर एंजीनियर खालिद हाशमी सीधे सीधे स्कूलों के 'पोएंट सिस्टम' को जिम्मेदार ठहराते हैं जिसके तहत दाखिले होते हैं.

उनका कहना है, ''इसमें कुछ इलाकों को जानबूझ कर कम अंक दिए जाते हैं जबकि पास ही के इलाकों को अधिक अंक गए हैं. कम अंक दिए जाने वाले इलाकों में मुसलमान बहुसंख्यक हैं.''

कम मुस्लमान बच्चे

इस साल दिल्ली के निजी स्कूलों में नर्सरी कक्षा में दाखिल किए गए बच्चों के आंकड़ों को देखें तो यह सामने आता है कि इनमें मुसलमान बच्चों की संख्या बहुत कम है.

दाखिल हुए बच्चों की जानकारी अपनी वेबसाइट पर देने वाले 92 स्कूलों में से 20 ने माना है कि उन्होंने अपने स्कूल में किसी मुसलमान बच्चे को दाखिल नहीं किया है.

इसके अलावा 17 स्कूलों ने माना है कि उन्होंने केवल एक मुसलमान बच्चे को दाखिल किया है.

हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन है कि दिल्ली के स्कूलों में किस हद तक ये पक्षपात है.

यह जानकारी जुटाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल खालिक ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को लिखे पत्र में आरोप लगाया है कि यह आंकड़े दर्शाते हैं कि मुसलमानों के बच्चों को अच्छी शिक्षा से वंचित रखा जा रहा है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''मैंने सरकार पर छोड़ा है कि इस समस्या को कोई हल ढूँढें.''

'असंतोष'

पत्र में उन्होंने लिखा है, ''राजधानी में दुर्भाग्य से अच्छी शिक्षा केवल निजी स्कूलों में है जहां से पढ़े बच्चे बाकियों के मुकाबले नौकरियां पाने या आगे दाखिलों में फायदे में रहते हैं.'

उन्होंने कहा है कि इससे मुसलमानों में 'काफी असंतोष' है. उन्होंने कहा है कि मुसलमानों की आबादी कुल आबादी की 15 प्रतिशत है जबकि दिल्ली के स्कूलों में नर्सरी में दाखिल किए गए बच्चे 0.5 प्रतिशत से भी कम है.

मुख्यमंत्री से आवश्यक कार्रवाई करने की अपील करते हुए उन्होंने कहा है कि इसके लिए स्कूलों का दाखिले के लिए अलग-अलग नियम होना भी जिम्मेदार है.

उन्होंने यह भी कहा है कि कई स्कूलों ने दाखिल किए गए बच्चों की जानकारी जानबूझ कर अपनी वेबसाइट पर नहीं डाली है, हालांकि यह अनिवार्य है.

पूछने पर एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक जेएस राजपूत ने कहा कि उन्हें यह जान कर कोई आश्चर्य नहीं हुआ है कि स्कूलों में कम मुसलमान बच्चों को दाखिल किया गया है.

उन्होंने कहा, ''नीतियां बनाने वाले अक्सर स्कूल प्रबंधनों के हक में नीति बनाते हैं. इसी के चलते कई बार कुछ कमियां रह जाती हैं.''

संबंधित समाचार