घरेलू हिंसा की आपबीती.......

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Image caption तमाम कानूनों के बावजूद घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी हो रही है

पत्रकार नीता भल्ला अपने ऊपर हुई शारीरिक और मानसिक हिंसा की कहानी सुनाती हैं और ये वो कहानी है जो कि भारत के पुरुष प्रधान समाज में आमतौर पर देखने को मिलती है. आप भी सुनें नीता भल्ला की कहानी उन्हीं की जुबानी.

मैं शीशे के सामने खड़ी होकर अपने चेहरे और शरीर को देख रही हूं. मैं अभी भी इस बात का यकीन नहीं कर पा रही हूं कि मेरे साथ कैसे ये सब हुआ.

इस घटना को छह दिन हो गए हैं. उसने मेरे चेहरे को दीवार पर दे मारा था. उस कारण चेहरे के दाहिनी ओर सूजन हो गया था हालाकि छह दिनों के बाद उसमें थोड़ी कमी आई है.

आंख के पास जहां उसने मारा था वहां नीला पड़ गया है. हाथ और पैर पर भी जहां उसने मारे थे, वहां के निशान अब धीरे-धीरे खत्म हो रहें हैं.

मेरे गर्दन पर लगी चोट के निशान सबसे तेजी से खत्म हो रहें हैं लेकिन आज भी स्थिति ये है कि मैं अपने गले पर स्कार्फ लगाकर ही दफ्तर जाती हूं.

वैश्विक समस्या

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में हर दस में से छह औरतों की यही कहानी है जो घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं. ज्यादातर मामलों में वे महिलाएं अपने पति या करीबी साथी के जरिए की गई हिंसा की शिकार होती हैं.

और बात अगर भारत की करें जहां मैं रहती हूं तो यहां की स्थिति भी कोई बहुत अच्छी नहीं है.

भारत में करीब 37 प्रतिशत महिलाएं अपने पतियों की वजह से घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. ये आंकड़े भारत सरकार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के हैं.

जबकि घरेलू हिंसा के खिलाफ़ लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि वास्तव में ये आंकड़े और ज्यादा हो सकते हैं.

लेकिन अफसोस की बात ये है कि तमाम जागरूकता और महिलाओं के पक्ष में बने कानूनों के बावजूद आज भी स्थिति ये है कि बहुत सी औरतें घरेलू हिंसा के खिलाफ मुंह खोलने से बचती हैं.

मेरे लिए ये आंकड़ें कोई चौकाने वाले नहीं हैं लेकिन हां इस बात पर जरूर हैरानी होती है कि मैं भी अब केवल उन आंकड़ों का एक हिस्सा हूं.

दक्षिण एशिया में महिला अधिकार के मुद्दे पर पिछले तीन साल के अपने रिपोर्टिंग अनुभव के आधार पर मैं कह सकती हूं कि मैंने इस तरह की तमाम घटनाओं को देखा है जो कि इस पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं झेलती हैं.

चाहे कन्या भ्रूण हत्या का मामला हो, या दहेज के लिए ससुराल में बहुओं को जलाया जाना हो या फिर सम्मान की खातिर पिता या भाईयों के ज़रिए की जा रही लड़कियों की हत्याएं हों, मैंने उन सबको अपनी आंखों से देखा है.

मैंने उत्तरी भारत के तमाम गांवों का दौरा किया जहां वो अपना दर्द अपने भीतर छिपाए रखती हैं. घूंघटों के अंदर से रोती हुई औरतों ने मुझे बताया कि किस तरह शादी के नाम पर उन्हें बेचा गया, गुलामों की तरह रखा गया, पतिओं ने ही उनका बलात्कार किया और कई मामलों में तो पति के भाईयों ने भी जबरन उनके साथ शारिरिक संबंध कायम किए.

चुप्पी

राजधानी दिल्ली के कई महिला पनाहगाह में मैंने घंटों तक उन पीडित महिलाओं से बातचीत की हैं जो बताती है कि किस तरह शराब पीकर उनके पतिओं ने उन पर किरासन तेल छिड़क कर शरीर के कई अंगों को जला दिया था.

मैंने कई स्वास्थ्य कर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकारी अधिकारियों से तमाम मुद्दों पर बातचीत की और समझने की कोशिश की है कि इन सबके पीछे आखिर वजह क्या है.

महिलाओं के खिलाफ़ शारीरिक और यौन हिंसा दुर्भाग्यवश हर समाज की एक सच्चाई है लेकिन भारत में जिस तरह इसे आमतौर पर समाज की स्वीकृति है वो बात समझ से परे है.

भारत में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक करीब 51 प्रतिशत पुरुष और 54 प्रतिशत महिलाएं पुरुषों द्वारा महिलाओं को पीटने को न्यायसंगत ठहराते हैं.

और इन सब पर लोगों की चुप्पी के कारण समाज में घरेलू हिंसा को और ज्यादा स्वीकृति मिलती है.

हिंसा की शिकार महिलाओं की खामोशी तो समझ में आती है कि वो डरती हैं या फिर उनका इतना सशक्तिकरण नहीं हुआ है कि वो आगे आकर इसके खिलाफ आवाज उठाएं लेकिन ये बात बिल्कुल समझ में नहीं आती कि आखिर उनके परिवार के लोग, दोस्त यार , पड़ोसी और या फिर राह चलते लोग कैसे इससे अपनी आंखें बंद कर लेते हैं.

साक्षात्कार के दौरान घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं ने ये भी बताया कि उनके परिवार वालों को इसकी जानकारी कैसे हुई और सब कुछ जानने के बावजूद किसी ने कुछ नहीं किया.

पहले मुझे ये बात समझ में नहीं आ रही थी कि लोगों की खामोशी की वजह क्या है लेकिन अब शायद लोगों की इस चुप्पी की वजह समझ में आने लगी है.

जब उसने मेरे बाल खींचे और मुझे मारा, मैं सड़क के किनारे गिरी हुई थी लेकिन मेरे किसी पड़ोसी ने अपनी खामोशी नहीं तोड़ी. उन सबों ने मेरी चिखें सुनी लेकिन मेरी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया.

जब वो मुझे पीट रहा था , मुझ से कुछ ही फीट के फासले पर कुछ नौजवान लड़के खडे़ थे लेकिन वे सब मुझे पीटते हुए देखते रहे और कुछ नहीं कहा. रोड के उस तरफ ढेर सारे ऑटो चालक मौजूद थे लेकिन सब खामोश रहे.

जानकारों का कहना है कि भारत में महिलाओं के प्रति होने वाली घरेलू हिंसा के पीछे तमाम वजहें हैं और इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं.

मुझ पर जो गुजरी उसकी एक वजह तो उस पुरूष की असुरक्षा की भावना और झुंझलाहट हो सकती है कि वो उस महिला को काबू में नहीं रख पा रहा था जिसे वो अपनी निजी संपत्ति समझता है. और ये सोच शायद दुनिया भर के पुरूषों की होती है.

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ जो हिंसा होती है उसका प्रमुख कारण समाज में काफी गहराई तक अपनी जड़े मजबूत किए हुए सदियों पुरानी भेद-भाव पूर्ण सोच है.

पिछले दो दशकों में भारत के आर्थिक विकास दर में हो रही बढ़ोत्तरी और 'पश्चिमी उदारवाद' के असर के बावजूद भारत में अभी भी महिलाएं उपभोग की एक वस्तु समझी जाती हैं.

गरीबी, निरक्षरता, लैंगिंक भेदभाव के खिलाफ बने कानूनों का सख्ती से पालन ना होना और महिला सशक्तिकरण के बहुत कम अवसर इत्यादि के कारण ग्रामीण इलाकों से लड़कियां दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में जबरन लाई जाती हैं और घरों में काम करने के लिए मजबूर होती हैं जहां उनका यौन उत्पीड़ना और बलात्कार होता है.

लेकिन कन्या भ्रूण हत्या, इज्जत के नाम पर की जाने वाली हत्याएं, बहुओं को स्टोव गैस से जलाने की घटनाएं वगैरह ऐसी हिंसा हैं जिनका संबंध यहां की संस्कृति से है जहां किसी महिला के यौन आचरण को उसके परिवार की इज्जत से जोड़ कर देखा जाता है और जहां भारी भरकम दहेज दिए बगैर लड़की की शादी मुमकिन नहीं.

मैं अभी भी ये सोचती रहती हूं. ''मेरे साथ ऐसी घटना नहीं हुई. मेरे जैसी महिलाओं के साथ ऐसा नहीं होता है.''

भारत में घरेलू हिंसा की शिकार बनी महिलाओं के बारे में हम पढ़ते रहते हैं. वो ज्यादातर गरीब घरानों से ताल्लूक रखने वाली अनपढ़ होती हैं जिससे ये धारणा बनी हुई है कि भारत में घरेलू हिंसा की वारदातें सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से समाज के निचले हिस्से के लोगों में ही होती हैं.

लेकिन सच्चाई ये है कि भारत में कामकाजी महिलाएं भी घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं पर वो इसके खिलाफ आवाज उठाने से बचती हैं.

घरेलू हिंसा की शिकार कुछ शादी शुदा महिलाएं इस वजह से खामोश रहती हैं कि अगर वो अपनी जुबान खोलेंगी तो उन पर घर तोड़ने का आरोप लगेगा, जबकि अकेली रह रही कामकाजी महिलाएं इस कारण खामोश रहती हैं कि अगर वो इस तरह की बात करेंगी तो पुरूष प्रधान दफ्तर के माहौल में उन्हें कमजोर समझा जाएगा.

और शायद इसीलिए आज एक पढ़ी-लिखी काम काजी, आजाद ख्यालों वाली मेरी जैसी महिला भी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(ऐम्स) के ट्रॉमा सेंटर में है और नर्स से अपने घावों पर पट्टी बंधवा रही है.

मेरे डॉक्टर, दफ्तर में मेरे सहयोगी, मेरे पड़ोसी और दोस्तों की तरह वो नर्स भी उतनी ही आश्चर्यचकित है जितना की मैं हूं.

वो सारे मेरी आंखों में आंखें डालकर बस यही सवाल कर रहे हैं, ''ये आपके साथ कैसे हो सकता है.''

डरी और सहमी हुई मुझे एहसास होता है कि ये किसी के साथ भी हो सकता है.

(घरेलू हिंसा की शिकार पत्रकार नीता भल्ला की कहानी, उन्हीं की जुबानी)

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