आज किसके पास नहीं है मोबाइल फोन?

Image caption भारत में मोबाइल फोन की संख्या शौचालय से ज्यादा हो गई है.

आज मोबाइल फोन के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल लगता है. मोबाइल पर हम बातें करते हैं, संदेश भेजते हैं, इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और तो और अब तो पैसे भी ट्रांसफर करते हैं.

मोबाइल फोन यदि एक दिन के लिए छूट जाए तो ऐसा लगेगा कि सब कुछ ठहर सा गया है लेकिन अभी भी ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो मोबाइल फोन रखने की हैसियत नहीं रखते.

पिछले कुछ वर्षों में भारत में मोबाइल फोन की संख्या तेज़ी से बढ़ी है.

दिल्ली सरकार के 2011 के आंकड़ों के मुताबिक शहर में मोबाइल फोन कनेक्शन की संख्या यहां की जनसंख्या की लगभग दोगुनी हो गई है.

वहीं 2011 जनगणना की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में मोबाइल फोन की संख्या शौचालयों से भी ज्यादा हो गई है.

युवाओं की पसंद

दरअसल आज फोन एक बड़ी ज़रूरत बन गई है. खासकर युवा वर्ग में तो मोबाइल फोन बेहद लोकप्रिय है.

दिल्ली की एक कॉलेज में पढ़ रहीं श्वेता का कहना है, "फोन हम लड़कियों के लिए बहुत जरूरी हो गया है. मां-बाप हमसे लगातार संपर्क में रहते हैं और हमें कहीं आना जाना होता है तो भी फोन के ज़रिए घर वालों को हमारा पता रहता है." युवा वर्ग के लिए मोबाइल का मतलब दोस्ती भी है और सुरक्षा की जरूरत भी.

फोन का नहीं होना डिजिटल डिवाईड यानी संचार की दृष्टि से लोगों के बंटवारे का बड़ा सूचक माना जाता है और ये खाई कुछ खास वर्गों के बीच में सबसे ज्यादा देखी जा सकती है.

डिजिटल डिवाईड

दिल्ली विश्विद्यालय के रामजस कॉलेज में डॉ. सुमनजीत सिंह पढाते है और उन्होंने संचार के क्षेत्र में शोध भी किया है.

उनका कहना है कि मोबाइल फोन के उपयोग में पुरुष और महिलाओं के बीच और शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच बड़ा अंतर है.

वो कहते हैं,"भारत में बड़े शहरों और छोटे शहरों के बीच अंतर बहुत ज्यादा है. दिल्ली जैसे मेट्रो में फोन यहां कि जनसंख्या से ज्यादा हो गए हैं लेकिन गांवों की बात अलग है. न सिर्फ पैसों के लिहाज से बल्कि लोगों की शिक्षा, समझ और फोन ऑपरेटरों के अलगाव की वजह से भी गांवों में और दूर-दराज के इलाकों में टेलीडेंसिटी, यानी फोन की संख्या, कम है. वहीं महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कम आत्मनिर्भर हैं और इसकी वजह से फोन भी उनके पास कम है."

दिल्ली की सड़कों पर मजदूर तबके के पास भी मोबाइल फोन देखा जा सकता है. ऐसे कई परिवार हैं जो शायद दूध और फलों पर खर्च के बजाए फोन पर खर्च कर रहा है.

Image caption फोन समाज के समग्र विकास के लिए भी जरूरी माना जाता है.

राजीव कुमार दस साल पहले बिहार के बरौनी से दिल्ली आए और यहां रिक्शा और ठेला चलाकर जीवन यापण करते हैं.

उनका कहना है कि फोन न सिर्फ घरवालों के साथ संपर्क में रहने के लिए बल्कि अपने काम काज में जरूरी हो गया है. उन्होंने कहा, "फोन पर खर्च के बजाए अगर दूध और फलों पर खर्च किया जाए तो बढ़िया है. लेकिन आज फोन का न होना बड़ी मुसीबत भी बन गई है इसलिए मैंने भी मोबाइल रखा है."

विकास की सीढ़ी

विकास के क्रम में फोन की जरूरतों के बारे में भारतीय जनसंचार संस्थान में विकास पत्रकारिता पढ़ा रहीं प्रोफेसर सुनेत्रा सेन नारायन कहती हैं, "टेलिकॉम के जरिए लोग काफी जानकारी पा सकते हैं. किसान फसल की कीमतों के बारे में जान सकते हैं, डॉक्टर और नर्स इसका इस्तेमाल इ-मेडिसीन द्वारा इलाज में कर सकते हैं और शिक्षा में भी फोन का उपयोग हो सकता है."

तो आज फोन सिर्फ जुड़े रहने भर के लिए नहीं बल्कि समाज के समग्र विकास के लिए भी जरूरी हो गया है.

विकास की यात्रा में दूसरंचार की भूमिका काफी अहम है और टेलीफोन उसका बड़ा भागीदार है.

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