बँटवारे में छूट गया स्वर्ण पदक अब मिला

Image caption दीनानाथ मलहोत्रा भारत आने के बाद प्रकाशन व्यवसाय से जुड़ गए

सात दशक का समय बहुत बड़ा होता है और वो भी तब जबकि इस दौरान आपका सामना दुनिया की एक बड़ी त्रासदी से हुआ हो. लेकिन इस त्रासदी के बावजूद यदि किसी की छूटी हुई चीज उम्र के आखिरी पड़ाव पर मिले और वो भी पूरे सम्मान के साथ तो इसकी खुशी को बयान करना मुश्किल है.

दिल्ली में रहने वाले दीनानाथ मलहोत्रा को भारत बँटवारे के पहले एमए की परीक्षा में पंजाब विश्वविद्यालय की ओर से स्वर्ण पदक देने की घोषणा हुई थी, लेकिन उसे हासिल करने के लिए उन्हें 68 साल लंबा इंतजार करना पड़ा.

शुक्रवार की शाम नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग में उन्हें सम्मानपूर्वक ये पदक दिया गया. भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त शाहिद मलिक ने दीनानाथ मलहोत्रा को पदक प्रदान किया.

इस अवसर पर भारत की ओर से सांसद मणिशंकर अय्यर उपस्थित थे.

पदक लेने के बाद मलहोत्रा ने अपने संक्षिप्त भाषण में आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इससे भारत और पाकिस्तान के रिश्ते और मज़बूत होंगे.

लंबी कहानी

इससे पहले सुबह दिल्ली के ज़ोर बाग स्थित अपने निवास पर बीबीसी के साथ खास बातचीत में दीनानाथ मलहोत्रा इस स्वर्ण पदक के बारे में कुछ इस तरह बताया, “मैंने 1944 में पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से एमए पास किया राजनीति शास्त्र में. उसमें मेरी पहली पोजीशन आई. उस वक्त पहली पोजीशन लाने वाले को गोल्ड मैडल मिलता था.”

उन्होंने कहा, “ऐसी परंपरा थी कि वहां के गवर्नर दीक्षांत समारोह में ये स्वर्ण पदक देते थे. लेकिन ये पदक इंग्लैंड से बनकर आते थे, इसलिए प्रतीकात्मक रूप से तत्काल उसका एक डमी दे दिया जाता था और बाद में असली स्वर्ण पदक मिलता था.”

बकौल दीनानाथ, उस वक्त उन्हें भी समारोह के दौरान डमी मैडल दिया गया. जिसे उस समय उन्होंने लेकर बाद में रजिस्ट्रार को वापस कर दिया.

छह दशक पुराने कॉलेज के दिनों की याद में खोए मलहोत्रा ने कहा, “पंजाब यूनिवर्सिटी बड़ी मशहूर थी. खचाखच भरे हॉल में मुझे मैडल दिया गया. लेकिन उसके बाद 1947 आ गया, भारत का विभाजन हो गया और मैडल लेने की बात आई गई हो गई.”

इस बीच दीनानाथ महरोत्रा भारत प्रकाशन व्यवसाय से जुड़ गए और अब वे मशहूर हिंद पाकेट बुक्स के मालिक हैं.

नया सिलसिला

इस पदक को लेकर नया सिलसिला शुरु हुआ कुछ वर्ष पहले.

एक दिन प्रकाशकों के एक संगठन के साथ दीनानाथ मलहोत्रा जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक बड़े अधिकारी से मिले तो उन्होंने बातों बातों में इसका ज़िक्र किया.

Image caption मलहोत्रा परिवार विभाजन के बाद भारत आ गया था

इस मामले में बड़ी भूमिका निभाई फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन पब्लिशर्स के कोषाध्यक्ष शक्ति मलिक ने.

शक्ति मलिक कहते हैं कि इतिहास में शायद ये पहली बार हुआ है कि 68 साल बाद किसी को मैडल मिल रहा है और वो भी पड़ोसी देश से.

बीबीसी से उन्होंने कहा, “संयोग की बात है कि पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ और पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर दोनों के वाइस चांसलर एक दूसरे को जानते थे. अधिकारी महोदय ने इन लोगों से इस बारे में बात की. दोनों ने ही इसमें रुचि दिखाई और लाहौर के वाइस चांसलर ने कहा कि हम पूरी जानकारी लेने के बाद इस पर कार्रवाई करेंगे.”

इसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर के वाइसचांसलर मैडल देने के लिए राज़ी हो गए. बाक़ायदा कार्यक्रम बन गया.

लेकिन ऐसा लगा मानों अभी इसका वक़्त नहीं आया था.

मलहोत्रा बताते हैं, "सारी जांच-पड़ताल के बाद हमें मैडल लेने के लिए लाहौर बुलाया गया लेकिन इस दौरान मुंबई में चरमपंथी हमले की 26/11 वाली घटना हो गई और हमारा जाना टल गया."

शक्ति मलिक बताते हैं कि मुंबई हमलों के बाद इस संबंध में दोबारा बातचीत शुरू हुई और तय हुआ कि नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग में मैडल दिया जाएगा.

विभाजन की टीस

दीनानाथ मलहोत्रा इसे महज एक संयोग ही कहते हैं.

उनका कहना है, “इस बारे में मेरी तरफ से कोई कोशिश नहीं हुई क्योंकि भारत आने के बाद मैं विश्वविद्यालय में तो किसी को जानता नहीं था. विभाजन के बाद मेरा कभी जाना भी नहीं हुआ.”

Image caption दीनानाथ मेहरोत्रा को पदक पाने के लिए छह दशक तक इंतजार करना पड़ा

ये पूछने पर कि क्या लाहौर जाने की इच्छा होती है, वे कहते हैं कि इच्छा भी होती है और दो-एक बार प्रोग्राम भी बना, लेकिन जाना नहीं हो पाया.

मलहोत्रा कहते हैं, “वैसे वहां का जीवन बहुत याद आता है. लोगों में बड़ा प्रेम-भाव था, जब भी मिलते थे हम एक-दूसरे से तो झप्पी मार के मिलते थे.”

सिर्फ दीनानाथ मलहोत्रा ही नहीं, उनकी पौत्री प्रियंका मलहोत्रा भी लाहौर जाने की अपनी इच्छा को रोक नहीं पातीं.

वो कहती हैं, “हम लोग तो चाहते थे कि लाहौर में ही मैडल मिले और इसी बहाने हम लोगों को भी वहां जाने का मौका मिलता.”

विभाजन का दर्द झेल चुके दीनानाथ मलहोत्रा उस दौर को याद करने से भी बचते हैं.

लेकिन कुछ कुरेदने पर कहते हैं, “मेरा मानना है कि देश के विभाजन जैसी कोई और घटना दुनिया में नहीं हुई. लेकिन इस पर ठीक से कुछ लिखा नहीं गया. मेरी इच्छा है कि विभाजन के बार में लिखा जाना चाहिए जिससे लोगों को इससे सबक मिल सके.”

बहरहाल उम्र के आखिरी पड़ाव पर उम्र की शुरुआती उपलब्धि का प्रमाण पा रहे दीनानाथ बेहद खुश हैं.

और खुशी को इस तरह बयान करते हैं, “मैंने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे ये मैडल मिलेगा और वो भी इस तरह. लेकिन ये मेरे लिए बड़ी इज्जत की बात है. न सिर्फ मेरे लिए बल्कि पूरे एकेडमिक सर्कल के लिए भी और दोनों देशों के लिए भी. जाहिर है, मेरे लिए ये एक खुशी का लम्हा है.”

उनका पूरा परिवार इस क्षण का इंतज़ार कर रहा है.

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