बादल ने क्यों की राजोआना की 'पैरवी'

बलवंत सिंह
Image caption बलवंत राजोआना ने फांसी की सजा सुनाए जाने के फैसले के विरुद्ध किसी अदालत में अपील नहीं की है

बेअंत सिंह हत्याकांड में दोषी ठहराए गए बलवंत सिंह राजोआना को इस शनिवार को फाँसी की सजा दिए जाने के एक चंडीगढ़ कोर्ट के आदेश के बाद पंजाब में राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक माहौल गरमा गया. हालाँकि केंद्र सरकार ने बुधवार देर शाम फांसी दिए जाने पर रोक लगा दी है लेकिन इस पूरे मुद्दे से कई राजनीतिक और कानूनी सवाल पैदा हुए हैं.

वर्ष 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह चंडीगढ़ में हुए एक आत्मघाती बम धमाके में मारे गए थे. बलवंत सिंह और कुछ अन्य को इस मामले में दोषी ठहराया गया और राजोआना ने एक अगस्त 2007 को चंडीगढ़ की विशेष सीबीआई अदालत ने फाँसी की सजा सुनाई. लेकिन राजोआना ने इसके खिलाफ किसी उच्च अदालत में अपील नहीं की है.

सिख मुद्दों पर अकाली दल की मजबूरी

पहले राजनीतिक मुद्दों पर नजर डालें तो पंजाब में सत्ताधारी अकाली दल के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल बुधवार को दिल्ली में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मिले और राजोआना को माफी देने की अपील की. इसके बाद केंद्र ने फांसी पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए जिन्हें मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह ने मीडिया को पढ़ कर सुनाया.

सवाल ये उठता है कि हाल में हुए चनावों में सिख धर्म और पंजाब समस्या से संबंधित मुद्दों को प्रचार से दूर रखने वाले अकाली दल किस मजबूरी के तहत ये मुद्दा उठाया?

गौतलब है कि ये सब उस समय हुआ जब राजोआना ने पटियाला जेल से जारी एक पत्र में सत्ताधारी अकाली दल पर सिखों को न्याय दिलाने के लिए कुछ न करने का आरोप लगाया है. उनका दावा था कि अकाली दल अब ऐसा इसलिए कर रहा है ताकि वह इस मुद्दे पर लोगों का समर्थन न खो दे.

इस पर अकाली दल के सचिव और विधायक डॉक्टर दलजीत सिंह चीमा स्पष्टीकरण देते हुए कहते हैं, "बात पंजाब के अमन, शांति और भाईचारे की है. जब बेअंत सिंह का परिवार जो पीड़ित है, उसने कह दिया कि वे उसे माफी देने पर आपत्ति नहीं, विपक्षी दल कांग्रेस ने कह दिया कि वो भी फांसी दिए जाने के पक्ष में नहीं है तो साफ है कि मुद्दा राजनीति का नहीं है. ये तो लोगों की भावनाओं का सम्मान करने का है."

Image caption मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह और उनके पुत्र उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह में कट्टरपंथी सिखों का मुद्दा हथिया लिया

पंजाब के पिछले 30 साल के घटनाक्रम पर एक पुस्तक के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं, "कुछ सिख संस्थाओं ने इस मुद्दे को उठाया और स्पष्ट है कि अकाली दल पर इससे खासा दबाव पड़ा. जब सिखों की धार्मिक मामलों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त ने इस मुद्दे को अपना लिया और अकाली दल के अध्यक्ष और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को राष्ट्रपति के समक्ष राजोआना के लिए रहम की अपील करने का निर्देश दिया तो उनके लिए इस स्थिति से मुँह मोड़ना कठिन हो गया."

सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त के आदेश पर जहाँ आम सिखों ने बुधवार को विरोध दिवस मनाया वहीं कुछ कट्टरपंथी सिख संगठनों ने पंजाब में बंद का आहवान किया था और राज्य के अधिकतर शहरों-कस्बों में जनजीवन इसके कारण प्रभावित हुआ.

'अकाली-भाजपा गठबंधन पर असर नहीं'

चाहे सत्ताधारी अकाली दल के नेता इस बंद को समर्थन देने से पल्ला झाड़ते रहे लेकिन सूत्रों के मुताबिक बंद को अकाली कार्यकर्ताओं का खासा समर्थन मिला. पर्यवेक्षकों का मानना है कि इससे पहले कि कट्टरपंथी संगठन इस मुद्दे पर कब्जा कर लेते, अकाली दल ने सोची समझी रणनीति के तहत राजोआना के मुद्दे को अपना बना लिया है और अब जब केंद्र सरकार ने रोक लगा दी है तो अकाली दल जरूर अपनी पीठ थपथपाएगा.

गौरतलब है कि पंजाब की गठबंधन सरकार में अकाली दल के सहयोगी भाजपा ने इस मुद्दे पर अलग रुख अपनाया. भाजपा का कहना था कि कानून प्रक्रिया पूरी हो उसके तहत की मामले का निपटारा हो. लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षक जगतार सिंह इसके कारण दोनों पार्टियों के गठबंधन धर्म निभाने में कोई अड़चन सामने आते नहीं देखते. उनका कहना है कि ज़रूरी नहीं कि हर मुद्दे पर दोनों सहयोगी एकमत हों.

अब कानूनी मसलों की बात करें तो फांसी पर रोक लगने से कानूनी मुद्दे लुप्त नहीं हो जाते. पहला तो ये कि अभियुक्त चाहे रहम की याचिका दायर न करे, कोई तीसरा व्यक्ति उसके हित में ऐसा कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट और पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के वकील रंजन लखनपाल कहते हैं, "कोई भी व्यक्ति अभियुक्त के लिए रहम की याचिका दायर कर सकता है. वैसे तो सरकार खुद ही इस तरह की राहत देने में भी सक्षम है."

कौन कर सकता है रहम की अपील

वरिष्ठ वकील रंजन लखनपाल का कहना है, "इस मामले में राजोआना के सह-अभियुक्त लखविंदर सिंह की अपील सुप्रीम कोर्ट में है. यदि उसे कोई राहत मिलती है तो वह राजोआना के मामले में भी लागू होगी. लेकिन यदि उसे अभी फांसी दे दी तो कानून के तहत आप उसे राहत कैसे दे पाएँगे. यदि अभियुक्त अपील न भी करे तो कानून की नज़र में उसकी अपील पेंडिग यानी लंबित मानी जाती है."

वे कहते हैं, "इस मुद्दे से जुड़ा एक अहम पहलू ये है कि भारत के संविधान में एक अपराध की दो बार सजा नहीं हो सकती. हत्या के मामले में या तो उम्रकैद होती है या फांसी. उम्रकैद में 12 या 14 साल की सजा होती और राजोआना 17 साल से जेल में हो तो एक तरह से उम्रकैद पहले ही काट चुका है. दूसरा ये कि जब 17 साल से ये व्यक्ति जेल में है तो आज क्या जल्दी है कि इसे आनन-फानन में फांसी दी जाए?"

चाहे पंजाब की राजनीति में सिख धर्म और पंजाब समस्या से संबंधित मुद्दे अपनी धार खो चुके हों लेकिन स्पष्ट है कि अकाली मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल बेअंत हत्याकांड के दोषी बलवंत सिंह को माफी देने की वकालत कर सिख धर्म से जुड़े लोगों का समर्थन सहेज कर रखना चाहते हैं.

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