राजोआना रहम के हकदार नहीं: केपीएस गिल

बलवंत सिंह
Image caption गिल के अनुसार बलवंत राजोआना की कार्रवाई से पंजाब के राजनीतिक और विकास के माहौल को बड़ा धक्का लगा था

पंजाब के पूर्व पुलिस प्रमुख केपीएस गिल ने कहा है कि पंजाब के राजनीतिक माहौल और विकास को बेअंत हत्याकांड से जो नुकसान पहुँचा, उसे देखते हुए इसके दोषी बलवंत सिंह राजोआना रहम के हकदार नहीं है.

बीबीसी हिंदी के साथ विशेष बातचीत में, पंजाब से चरमपंथ खत्म करने का श्रेय पाने वाले, पूर्व पुलिस प्रमुख ने कहा कि मानवाधिकार संगठनों - एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच के सालों तक पंजाब में किए कामकाज की विस्तृत जाँच होनी चाहिए.

बादल ने क्यों की राजोआना की पैरवी?

उनका आरोप है कि इन संगठनों ने कुछ वकीलों और पत्रकारों के सहयोग से पंजाब में चरमपंथ-समर्थकों के पक्ष में बड़ा अभियान चलाया और वे ये नहीं जानते थे कि ये लोग भारत की सुरक्षा के लिए कितना बड़ा खतरा हैं.

गौरतलब है कि केपीएस गिल के कार्यकाल के दौरान जहाँ उन्हें पंजाब में चरमपंथ को खत्म करने का श्रेय मिला वहीं मानवाधिकार संगठनों ने पुलिस के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए थे और फर्ची मुठभेड़ों के अनेक मामले न्यायालय में भी पहुँचे थे.

वर्ष 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की चंडीगढ़ में पंजाब-हरियाणा सचिवालय की परिसर में हत्या कर दी गई थी. बलवंत सिंह राजोआना और कुछ अन्य को वर्ष 2007 में फांसी की सजा सुनाई गई और चंडीगढ़ की एक अदालत ने 31 मार्च को राजोआना को फांसी दिए जाने का आदेश दिया था.

कई सिख संगठनों और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में फांसी के आदेश का विरोध हुआ है और बुधवार को केंद्र सरकार ने राजोआना को फांसी दिए जाने पर रोक लगा दी है.

'माहौल बिगड़ेगा - फर्जी दलीली'

बीबीसी के साथ बातचीत में गिल ने कहा, "ये कहना बिलकुल उचित नहीं है कि इस न्यायिक आदेश का पालन करने से पंजाब में स्थिति बिगड़ सकती है. जो चरमपंथ-समर्थक गुट हैं वो तकरीबन खत्म हो चुके हैं.इस बार चुनावों में तो उनका कोई भी व्यक्ति निर्वाचित तक होकर (विधानसभा में) नहीं आया है.वो केवल खुद को जीवित रखने के लिए ऐसे मुद्दे उठाते हैं."

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कुछ संगठनों पर तीखे प्रहार करते हुए उन्होंने कहा, "हाल में चंडीगढ़ में मेरे सामने एक अजीब - थीसिस - रखा गया कि राजनीतिक नेता की हत्या किसी अन्य हत्या से कम बड़ा अपराध है. ये मानसिकता चरमपंथ-समर्थक गुटों और तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के दिमाग में घर कर चुकी है. अगर आप पंजाब को देखें तो इन संगठनों - ह्यूमन राइट्स वॉच, एमनेस्टी इंटरनेशनल की भूमिका की जांच होनी चाहिए - ये लोग पंजाब में इतने साल क्या करते रहे हैं. इन लोगों ने एक बड़ा अभियान चलाया जिसमें वकील मिल गए, कुछ पत्रकार मिल गए, अमरीकन दुतावास मिल गया...वो ये नहीं जानते थे कि ये लोग (चरमपंथी) देश की सुरक्षा के लिए कितना बड़ा खतरा हैं."

राजोआना के समर्थकों की दलील कि वे 17 साल से जेल में हैं और कत्ल के जुर्म में भी भारतीय संविधान 12 से 14 साल या फिर फाँसी की ही सजा देता है, को केपीएस गिल ने खारिज किया.

'रहम के हकदार नहीं'

गिल का कहना था,"इस षड्यंत्र में मुख्य एक्टर, जो पुलिस ड्राइवर (दिलावर सिंह) था, वो वहीं मारा गया. बाद में हमें पता चला कि वो मेरी गाड़ियों के काफिले में भी घुस चुका था, लेकिन मेरे सुरक्षा कर्मचारियों ने उसे बाहर निकाल दिया. अचरज की बात है कि उस पर बाद में किसी ने नजर नहीं रखी. बेअंत सिंह की हत्या के बाद पंजाब के राजनीतिक माहौल और विकास पर जो असर पड़ा, उसे देखते हुए राजोआना किसी रहम के हकदार नहीं है. मैं खुद जानता हूँ कि अमरीका के कई लोग पंजाब में निवेश करने आ रहे थे लेकिन इस घटना के बाद वे पीछे हट गए."

पंजाब के मुख्यमंत्री के राजोआना मामले में पैरवी करने पर गिल का कहना था कि भारत में कई साल से किसी को भी फांसी नहीं दी गई है और ये रूझान बन गया है कि जब ऐसे मामले आते हैं तो कोई न कोई राजनीतिक दल दबाव बनाना शुरु कर देता है और वही बादल ने भी किया है. उनका कहना था कि तकरीबन सभी राजनीतिक दल इस तरह का हस्तक्षेप कर रहे हैं.

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