51 हजार करोड़ की परियोजना की मंजूरी रद्द

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Image caption पॉस्को को पिछले दिनों पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिली थी.

नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने दक्षिण कोरियाई कम्पनी पॉस्को के ओडिशा में प्रस्तावित इस्पात संयंत्र को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से मिली मंजूरी शुक्रवार को रद्द कर दी.

ट्राइब्यूनल ने इस संयंत्र को मंजूरी देने के पर्यावरण मंत्रालय के तरीके की आलोचना भी की है. साथ ही केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से कहा कि वह पिछले साल जनवरी में इस संयंत्र को दी गई मंजूरी की समीक्षा करे.

पॉस्को ऐसी परियोजना है जिस पर भारत में सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है.

ट्राइब्यूनल ने पर्यावरण मंत्रालय से मिली इसकी मंजूरी ऐसे समय में रद्द की है जबकि पिछले दिनों ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दक्षिण कोरिया को आश्वस्त किया था कि भारत में उनके निवेश सुरक्षित हैं.

सोमवार को प्रधानमंत्री ने कहा था, "कोरिया से निवेश भारत की प्राथमिकता है. हम निवेशकों की शिकायतों के बारे में सकारात्मक कदम उठाएंगे और देश में व्यापारिक वातावरण मजबूत करने का प्रयास करेंगे. मैं कोरियाई औद्योगिक संगठनों से अपील करता हूं कि भारत पर विश्वास करें."

मंत्रायल ने पिछले साल पॉस्को परियोजना को मंजूरी थी. इस स्टील संयंत्र के बनने के बाद प्रतिवर्ष 40 लाख मीट्रिक टन स्टील का उत्पादन हो सकेगा.

सरकार ने कंपनी को 400 मेगावाट पावर प्लांट बनाने के लिए भी मंजूरी दी थी.

ग्रीन ट्राइब्यूनल के इस फैसले पर केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री जयंती नटराजन का कहना था कि प्रक्रिया में पूरी तरह पारदर्शिता रखी जाती है और आगे भी ये जारी रहेगी.

उन्होंने कहा, "मेरा काम पर्यावरण को सुरक्षित रखना है और इस बात को सुनिश्चित करना है कि प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो. पारदर्शिता और पर्यावरण को दोनों को किसी भी कीमत पर बनाए रखा जाएगा."

कोरिया की दिग्गज स्टील कंपनी पोस्को ने कुछ दिनों पहले दावा किया था कि पारादीप में बनने जा रहे इसके प्लांट में हो रही देरी के चलते इसकी लागत में 20 फीसदी के करीब की बढ़ोत्तरी हो सकती है.

पॉस्को कंपनी उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में स्थित पारादीप के निकट यह प्लांट लगा रही है.

एक करोड़ बीस लाख टन सालाना क्षमता वाले इस प्लांट के लिए कंपनी ने पहले 51,000 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान व्यक्त किया था.

पॉस्को ने ओडिशा में एक इस्पात संयंत्र लगाने के लिए 22 जून, 2005 को ओडिशा सरकार के साथ एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया था.

कंपनी की योजना हर साल 120 टन इस्पात उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था.

लेकिन ये परियोजना स्थानीय स्तर पर होने वाले विरोध और पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी को लेकर काफी विवादों में रही.

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