वक्फ जमीन बाँटने का फैसला अवैधःअदालत

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Image caption 108 एकड़ की ज़मीन 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी की सरकार में दी गई थी

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में हैदराबाद में एक हाउसिंग परियोजना के लिए ज़मीन देने के सरकार के फ़ैसले को अवैध ठहराया है.

अदालत ने कहा है कि राज्य सरकार ने इसके लिए एक कंपनी को सौ एकड़ की जो ज़मीन आवंटित की थी वो वक्फ़ संपत्ति है.

इस फ़ैसले से कांग्रेस सांसद एल राजगोपाल की कंपनी लैंको को ज़बरदस्त धक्का लगा है.

इस कंपनी को 2006 में वाई एस राजशेखर रेड्डी की सरकार ने 108 एकड़ भूमि आवंटित की थी.

इस कम्पनी ने पहले उस ज़मीन पर एक टेक्नोलॉजी पार्क के निर्माण की योजना बनाई थी लेकिन बाद में वहाँ पर महँगे घर और बहुमंज़िला इमारतें बनाने का फ़ैसला किया गया.

उच्च न्यायालय ने ना केवल इस ज़मीन को बल्कि वहाँ के आस-पास की कुल 1654 एकड़ भूमि को वक़्फ़ संपत्ति बताया है और कहा है कि ये ज़मीन हज़रत हुसैन शाह वली की दरगाह की मिल्कियत है.

अदालत के फ़ैसले से लैंको कंपनी के साथ कई दूसरी बड़ी कंपनियों को भी धक्का लगा है जिन्हें वाईएसआर सरकार ने यह भूमि दी थी.

इनमें एमार प्रॉपर्टीज़, माइक्रोसॉफ़्ट, इन्फ़ोसिस, विप्रो, पोलारिस सॉफ्टवेयर तथा इंडियन स्कूल ऑफ़ बिजनेस के अलावा मौलाना आज़ाद उर्दू युनिवर्सिटी भी शामिल है.

हालाँकि वक्फ़ बोर्ड और दूसरे मुस्लिम संगठनों ने इन कंपनियों को ज़मीन देने के फ़ैसले का काफ़ी विरोध किया था लेकिन वाईएसआर सरकार ने उसे अनदेखा करते हुए यह ज़मीन उन कंपनियों के हवाले कर दी थी.

दिलचस्प मुक़दमा

2007 से इस भूमि को लेकर उच्य न्यायालय में चल रहे मामले की दिलचस्प बात यह थी की उसमें सरकार के दो विभाग एक दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे.

एक ओर अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और वक्फ़ बोर्ड इस भूमि पर अपना दावा कर रहे थे वहीं राजस्व विभाग का दावा था कि यह सरकारी भूमि है और वो इसे जिसे चाहे दे सकती है.

इस भूमि पर 7200 करोड़ रूपए की परियोजना के लिए निर्माण कर रहे लैंको ग्रुप ने इस भूमि को सरकारी भूमि साबित करने के लिए मशहूर वकील सोली सोराबजी की सेवाएँ ली थीं.

मगर वक्फ़ बोर्ड और हुसैन शाह वली दरगाह समिति के वकीलों ने उच्य न्यायालय में यह साबित कर दिया कि यह भूमि हैदराबाद के नवाब ने दरगाह को भेंट की थी और उसका पूरा सरकारी रेकार्ड भी अदालत में पेश किया गया.

उच्च नायालय ने आगे की कार्रवाई के लिए यह मामला वक्फ़ ट्राइब्यूनल के हवाले कर दिया है.

इस फ़ैसले ने राज्य सरकार की परेशानी और बढ़ा दी है क्योंकि ये फ़ैसला कई और ऐसे ही मामलों का पिटारा खोल सकता है.

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