'घपले' के आरोपों में फिर घिरी नीतीश सरकार

बिहार
Image caption विरोधी दलों ने इसी आधार पर वित्तीय घपले का आरोप राज्य सरकार पर लगाते हुए विधानसभा में भारी हंगामा मचाया

बिहार सरकार के वित्तीय प्रबंधन में कथित अनियमितता को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष में फिर ठन गई है.

नियंत्रक महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की ताज़ा रिपोर्ट इस टकराव का आधार बनी है.

रिपोर्ट में बताए गए अरबों रुपए के सरकारी हिसाब में गड़बड़ी को विपक्ष एक बड़े घोटाले का सबूत मानता है. उसकी मांग है कि सीबीआई इसकी जांच करे.

उधर राज्य सरकार इसे घोटाला मानने से इनकार करते हुए अब सफ़ाई देने में जुट गई है. इस तरह विवाद ज़ोर पकड़ने लगा है.

इसी सिलसिले में उप महालेखाकार अतुल प्रकाश ने बीबीसी को रिपोर्ट के सबसे ख़ास और विवादित हिस्से की जानकारी दी.

उन्होंने बताया ''जहाँ तक एडवांस कंटीजेंसी (एसी) और डिटेल कंटीजेंसी (डीसी) बिल में गड़बड़ी की बात है, तो वित्तीय वर्ष 2002 से 2011 तक अग्रिम के रूप में आकस्मिक ख़र्च के लिए एसी बिल के ज़रिए निकाले गये कुल 25331 करोड़ रूपए में से सिर्फ 2755 करोड़ रूपए ख़र्च के डीसी बिल- वाउचर सीएजी को मिले हैं. बाक़ी 22 हज़ार 575 करोड़ रूपए का कोई हिसाब राज्य सरकार ने नहीं दिया है. इसलिए अनियमितता की आशंका पैदा हुई है.''

आरोप

विरोधी दलों ने इसी आधार पर वित्तीय घपले का आरोप राज्य सरकार पर लगाते हुए विधानसभा में भारी हंगामा मचाया.

जबकि राज्य के वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ने इसे ख़र्च का सही समय पर विपत्र नहीं सौपने जैसी तकनीकी त्रुटि बताते हुए इसे दूर कर लेने का दावा किया है.

उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में कहा ''सीएजी को भेजे गए पंद्रह हज़ार करोड़ रूपए का डीसी बिल-वाउचर वहाँ बोरियों में बंद है और सीएजी दफ़्तर उसे खोलकर नहीं देख पाया है, इसलिए इतनी बड़ी रक़म का हिसाब नहीं मिलने का सवाल उठा है.''

हालांकि इस पर महालेखाकार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि एक साथ अचानक ढेर लगा दिये गये डीसी बिल-वाउचर में से अधिकांश के त्रुटिपूर्ण और संदिग्ध फोटो प्रतियाँ होने जैसी आपत्ति राज्य सरकार तक पहले ही पहुंचाई जा चुकी है.

दो साल पहले भी ठीक इसी तरह 'एसी- डीसी बिल घोटाले' का हंगामा खड़ा हुआ था. यह मामला पटना हाई कोर्ट में लम्बे समय तक अनिर्णय की स्थिति में लटके रहने के बाद ख़ारिज हो गया.

फिर आगे अपील में यही मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहाँ यह अब तक विचाराधीन है और सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों से इस पर और जानकारी तलब की है.

उस समय एसी-डीसी बिल से जुड़े कथित घपले की रक़म लगभग 11 हज़ार करोड़ रुपए आंकी गई थी और सीबीआई से जांच कराने की मांग काफ़ी ज़ोर पकड़ चुकी थी.

लेकिन राज्य सरकार ने इस मांग का ज़ोरदार विरोध किया था. पर अब सीएजी के ताज़ा वार्षिक प्रतिवेदन में बिना वाउचर-सबूत के ख़र्च हुई कुल राशि 22 हज़ार करोड़ रूपए से भी अधिक बताई जा रही है.

ज़ाहिर है कि एक बार फिर नीतीश सरकार इसी मामले में घिरी हुई दिख रही है.

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