भारतः निरक्षरता से हर साल अरबों का नुकसान

Image caption भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार 74 प्रतिशत आबादी साक्षर और 26 प्रतिशत निरक्षर है

एक रिपोर्ट के अनुसार निरक्षरता के कारण भारतीय अर्थव्यस्था को हर साल 53 अरब डॉलर (यानी क़रीब 2650 अरब रुपए) से ज्यादा का नुक़सान हो रहा है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसकी वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 12 खरब डॉलर का नुक़सान हो रहा है.

ये रिपोर्ट एक अंतरराष्ट्रीय संस्था वर्ल्ड लिटरेसी फाउंडेशन ने जारी की है जिसका मुख्यालय ऑस्ट्रेलिया में है.

संस्था ने अपने अध्ययन में भारत, चीन, ब्राज़ील जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से लेकर पश्चिम के विकसित देशों और बांग्लादेश, बर्मा, नेपाल जैसे देशों के बारे में अपना आकलन दिया है.

रिपोर्ट में लगाए गए अनुमान के हिसाब से ऐसे कई देश हैं जिन्हें निरक्षरता के कारण भारत से भी अधिक नुकसान हो रहा है. इनमें अमरीका, चीन, जापान, जर्मनी जैसे देश शामिल हैं. इसका मुख्य कारण ये है कि मुख्यतः विकसित देशों में दूसरे देशों की अपेक्षा सरकारें निरक्षरता से निबटने में अधिक खर्च करती हैं.

संस्था के मुख्य कार्यकारी एंड्र्यू के का कहना है कि इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कोई विकसित देश में रहता है या विकासशील देश.

उन्होंने कहा,"हमें निरक्षरता को एक बीमारी की तरह से लेना चाहिए जिसे दूर किया जाना चाहिए. इससे लोगों का जीवन बर्बाद हो रहा है. इसका संबंध गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक विलगाव, अपराध और बीमारियों से है."

रिपोर्ट

फाउंडेशन का कहना है कि पिछले कई वर्षों से निरक्षरता के आर्थिक प्रभावों का मूल्य पता लगाने की कोशिश होती रही है और इसकी गणना के तरीके को लेकर विवाद होता रहा है.

लेकिन उसका कहना है कि ये एक तथ्य है कि इससे हर साल वैश्विक अर्थव्यवस्था को 10 खरब डॉलर से अधिक का नुकसान हो रहा है क्योंकि आज विश्व में हर पाँचवें व्यक्ति को निरक्षरता से जूझना पड़ रहा है.

रिपोर्ट में निरक्षरता की माप के लिए अलग परिभाषा बनाई गई हैं. इसमें कहा गया है कि निरक्षरता दो तरह की होती है.

एक है पूर्ण निरक्षरता जिसमें कि व्यक्ति कुछ भी पढ़-लिख नहीं सकता. मगर संस्था के अनुसार फंक्शनल इलिटरेसी की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है जिसमें कि व्यक्ति को सामान्य पढ़ना-लिखना तो आता हो मगर वे उसका इस्तेमाल दैनिक जीवन में काम आनेवाले जरूरी चीजों की जानकारी हासिल करने में नहीं लगा सकते हैं.

रिपोर्ट में ऐसे कामों में दवाइयों के लेबल पढ़ पाने, बैंक खातों का हिसाब रख पाने या नौकरियों के आवेदन लिखने जैसे कामों में निरक्षरता से होनेवाली कठिनाइयों का उदाहरण दिया गया है.

रिपोर्ट के अनुसार,"दुनिया भर में लगभग 80 करोड़ लोग लिख-पढ़ नहीं सकते. लगभग सात करोड़ बच्चों को प्राइमरी स्कूल की शिक्षा नहीं मिल रही, लगभग इतने ही बच्चे सेकेंडरी स्कूल नहीं जा पा रहे".

नुकसान

रिपोर्ट में आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाने के लिए कई तरह के निर्धारकों पर ध्यान दिया गया है.

लोगों की व्यक्तिगत क्षमता के बारे में रिपोर्ट कहती है कि निरक्षरता से लोगों की व्यक्तिगत आय पर असर पड़ता है.

रिपोर्ट में कहा गया है,"दुनिया भर में इसका प्रभाव अलग-अलग है मगर आम तौर पर निरक्षर लोग अपने ही बराबर के साक्षर लोगों की तुलना में 30 से 42 प्रतिशत कम कमाते हैं."

इसके अलावा अध्ययन में संस्थाओं और दफ़्तरों को निरक्षरता से होनेवाले नुकसान का आकलन किया गया है और कहा गया है कि इस कारण से जहाँ उन्हें नुकसान होता है वहीं एक सर्वे में पाया गया कि 70 प्रतिशत संस्थाओं ने माना कि लोगों को साक्षर बनाने पर किए गए प्रयासों से उनके खर्चों में काफी कमी हुई.

इसके अतिरिक्त संस्था ने देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़नेवाले व्यापक प्रभाव का भी अध्ययन किया है.

संस्था का अनुमान है कि निरक्षरता और इससे निबटने के प्रयासों के कारण विकसित देशों के सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी को दो प्रतिशत का नुकसान होता है, जबकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं के जीडीपी को डेढ़ प्रतिशत और विकासशील देशों की जीडीपी को आधे प्रतिशत का.

रिपोर्ट के अनुसार ऐसा इसलिए है क्योंकि अल्पविकसित देशों में जनकल्याण के लिए सरकारें विकसित देशों की तुलना में काफ़ी काफ़ी कम खर्च करती हैं.

उसका कहना है कि कुल मिलाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को 11 खरब 90 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है.

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