यरूशलेम के लिए भारतीय हुए नजरबंद

Image caption कारवां में शामिल भारतीय दल पाकिस्तान और ईरान भी गया

फलस्तीन की आजादी के समर्थन में यरूशलेम ग्लोबल मार्च पर गया एक एशियाई दल बेरूत से वापस लौट आया है.

इस अंतरराष्ट्रीय दल में एशिया से लगभग एक दर्जन देशों के सदस्य थे जिनमें सबसे बड़ा दल भारत से था.

ग्लोबल मार्च टू यरूशलम का मकसद अलग अलग देशों से जमीन के जरिए यरूशलम पंहुचना था. एशियाई दल इंडोनेशिया से शुरु हुआ जबकि भारतीय दल पाकिस्तान, ईरान और तुर्की होते हुए लेबनान पंहुचा.

लेकिन इसराइल से आगे बढ़ने की इजाजत नहीं मिलने से उन्हें बेरूत में रोक दिया गया और वहां से वो वापस लौट आए.

सवाल

दल के एक प्रमुख सदस्य फिरोज मिठीबोरवाला ने कारवां की अहमियत बताते हुए कहा, "हमारा ये मानना है कि फ्लीस्तीन दुनिया का केंद्रीय सवाल है और उसका केंद्रीय सवाल यरूशलम है. हम चाहते हैं कि फिर से यरूशलम दनिया का राजनैतिक चिंतन का केंद्रीय सवाल बने औऱ इसके लिए लोगों को जागरूक करना भी जरूरी है. इसलिए हमने ये कारवां निकाला."

उन्होंने आगे कहा, "हमारी रणनीति थी की कारवां के जरिए लोगों का लोगों से संपर्क बने और इस तरह राजनैतिक अभियान को तेज किया जाए."

इस कारवां में कश्मीर की इंशा मलिक भी शामिल थी.

Image caption इंशा मलिक दिल्ली में एक विश्वविद्यालय की छात्रा हैं औऱ कारवां का हिस्सा थीं

उन्होंने कहा, "आम लोगों के बीच में बातचीत होना बहुत जरूरी है. रोजमर्रा की जिंदगी में हम लोग सरकारी राजनीति में इतना डूब जाते हैं कि हम अपने आदर्शों को भी कई बार भूल जाते हैं. लेकिन आम लोगों से मिलकर पता चलता है कि हमारे कई मुद्दे उनके सामने कितने सतही हैं."

भारतीय दल नौ मार्च को वाघा बॉर्डर पार करते हुए पाकिस्तान पंहुचा. वहां से ये लोग ईरान गए जहां उन्होंने राष्ट्रपति अहमदिनेजाद से भी भेंट की. ईरान से कारवां तुर्की को बढ़ा जहां पर लोकप्रिय सूफी संत रूमी की मजार पर फूल चढ़ाना दल के कई सदस्यों के लिए यादगार मौका रहा.

तुर्की से ये कारवां लेबनान पंहुचा जहां से उन्हें पानी के रास्ते यरूशलम जाना था.

नजरबंद

लेकिन लेबनान की राजधानी बेरूत में इस दल को जहाज पर ही रोक दिया गया. ये लोग 40 घंटों तक जहाज पर ही रहे जिसके बाद उन्हें वापस भेज दिया गया.

भूपेन सिंह एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और मीडिया शिक्षण से जुड़े हैं और इस कारवां का हिस्सा थे.

उन्होने कहा कि कई जगह उनका बहुत अच्छा स्वागत किया गया लेकिन एक जगह पर उन्हें नजरबंद भी रखा गया.

भूपेन ने कहा, "इसराइल ने शायद धमकी दी थी कि उसके पड़ोसी देशों से अगर प्रदर्शनकारी सीमा पार करते हैं तो वो उन्हें गोली मार देगा. इस वजह से शायद इसराइल के पड़ोसी देशों पर भी दबाव था और वो थोड़े सावधान थे. उन्होंने हमें रोक लिया और 40 घंटो तक बंदी रखा गया. इसके बाद भारतीय संसद में भी सवाल उठा. बेरूत में भारतीय दूतावास भी सक्रिय हुआ और बातचीत के बाद दूतावास के लोग हमें छुड़ाने आए. "

दल का मानना है कि इस कारवां को हर साल निकाला जाए और ये तो बस शुरुआत है.

फिऱोज कहते हैं, "ये अभी शुरुआत है. जब हम 'क्रिटिकल मास' तक पंहुच जाएंगे तो यरूशलम की सीमा के अंदर भी दाखिल होंगे और अपना आंदोलन करेंगे."

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