अंत बुरा तो सब बुरा

Image caption शताब्दी वर्ष स्मारिका का विमोचन करते उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी.

बिहार विधान परिषद् की सौवीं वर्षगाँठ से जुड़े कार्यक्रमों की अंतिम कड़ी कमज़ोर पड़ गई. शताब्दी समारोह की जानदार शुरुआत का बेजान-सा अंत सब को अखर गया.

गुरुवार को पटना में आयोजित समापन समारोह में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी बतौर मुख्य अतिथि शरीक थे.

उनका भाषण दो सदनों वाली विधायिका की ज़रूरतों पर केंद्रित था. लेकिन माहौल पर एक दूसरा ही विषय हावी हो चुका था.

सभागार की अधिकांश कुर्सियां खाली थीं. दर्शक या श्रोता के रूप में वहां आम लोग नहीं, सिर्फ राज्य के मंत्री, विधायक, अधिकारी या परिषद् के कर्मचारी ही दिख रहे थे.

मंच पर उपराष्ट्रपति के अलावा बिहार के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी बैठे थे, लेकिन सब की नज़र विधान परिषद् के सभापति ताराकांत झा पर टिकी हुई थी.

टिकट

कारण ये था कि राज्य विधान परिषद् में उनकी सदस्यता की मियाद ख़त्म हो रही है और उनकी पार्टी भाजपा ने उन्हें एक टर्म और बनाए रखने से इंकार कर दिया है.

उन्हें अपने दल से ऐसे झटके की आशंका नहीं थी. प्रेक्षक इसमें ख़ास तौर पर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की भूमिका और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सहमति बता रहे हैं.

शायद इसलिए बिलकुल बुझे-बुझे या खीजे हुए से लग रहे पंडित ताराकांत झा इस आयोजन को जैसे-तैसे निबटा देने की मुद्रा में दिखे यानी आयोजन के सूत्रधार का इस तरह उदासीन हो जाना यहां विधान परिषद् के शताब्दी समारोह पर ' अंत बुरा तो सब बुरा ' जैसा उल्टा असर छोड़ गया.

तारीफ

इसी समारोह में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब काफ़ी देर तक और दिल खोलकर ताराकांत झा की प्रशंसा करते रहे, तो दर्शकों में खुसुर-फुसुर शुरू हो गई.

लोग एक-दूसरे से कह रहे थे, ''लगता है नीतीश जी विधान परिषद् से झा जी की विदाई वाले समारोह में बोल रहे हैं और झा जी मन-ही-मन कुढ़ रहे हैं.''

उधर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी अपने भाषण में विधान परिषद् की उपयोगिता और मौजूदा सियासी मुश्किलों का विश्लेषण कर रहे थे.

Image caption बिहार अपनी स्थापना की सौवीं वर्षगांठ मना रहा है.

लेकिन सुनने वालों की दिलचस्पी उस तरफ़ कम और परिषद् के अन्दर चल रही चुनावी राजनीति में ज्यादा थी.

फ़िलहाल स्थिति ये है कि नीतीश कुमार और सुशील मोदी फिर से, यानी दोबारा विधान परिषद् की सदस्यता के लिए नामांकन पत्र दाख़िल कर चुके हैं.

साथ ही राष्ट्रीय जनता दल की तरफ से पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने भी परचा भरा है और इन तीनों नेताओं का चुना जाना निश्चित है.

परिषद् की ख़ाली हो रही कुल ग्यारह सीटों के लिए ग्यारह उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं, इसलिए इन सब के निर्विरोध चुन लिए जाने का रास्ता साफ़ हो चुका है.

जबकि ताराकांत झा के लिए उम्मीद की एक किरण अब राज्यपाल द्वारा मनोनयन के रूप में बाकी बची है.

माना जा रहा है कि इस सबसे इस चुनावी माहौल में परिषद् का शताब्दी समापन समारोह आख़िरकार बदरंग हो ही गया.

जनता रही गायब

हालांकि इस समारोह के फीके पड़ जाने की एक और वजह ये रही कि उसी दिन बिजली के मसले को लेकर 'पटना बंद' का भी आह्वान किया गया था.

बिजली शुल्क में पिछले दो वर्षों में कई बार कई तरह की वृद्धि से बेहद नाराज़ उपभोक्ताओं ने विरोध स्वरुप हड़ताल और प्रदर्शन का सिलसिला चला रखा है.

यही कारण था कि गुरुवार को परिषद् के समारोह में आम आदमी की भागीदारी लगभग नहीं के बराबर रही.

पटना के लोग यहां उपराष्ट्रपति के आगमन को लेकर प्रशासन द्वारा सड़कों पर की गई घेराबंदी से उत्पन्न समस्या पर खासे क्रुद्ध थे.

कई जगहों पर पुलिस के साथ उन लोगों की झडपें हुईं, जो कड़ी धूप में सड़क जाम से जूझ रहे थे और 'वीवीआइपी' के खिलाफ तीखे शब्द भी उछाल रहे थे.

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