भारत में भी कई 'शाहरुख़' हैं !

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Image caption शाहरुख खान को अमरीका में दूसरी बार परेशानी उठानी पड़ी (फाइल फोटो)

न्यूयॉर्क के एक हवाई अड्डे पर फिल्म स्टार शाहरुख खान को दो घंटे तक रोके रखने की घटना ने फिल्मी सितारों और उनके प्रशंसकों में हलचल मचा दी है.

इस घटना ने एक बार फिर वही सवाल उठाया है कि नाम, क्षेत्रीयता या फिर समुदाय के आधार पर सुरक्षा बलों का लोगों पर संदेह करना और कई बार तो उन्हें परेशान करना, किस हद तक सही है.

ये तो सभी जानते हैं कि शाहरुख खान कोई धार्मिक कार्यों से जुडे़ व्यक्ति नहीं हैं और पूरी दुनिया उन्हें एक फिल्म अभिनेता के रूप में जानती है.

लेकिन शायद न्यूयॉर्क एयरपोर्ट के एक कमरे में दो घंटे तक बैठे रहने और अमरीकी अधिकारियों के सवालों का जवाब देते हुए शाह रुख खान को शायद यह लग रहा हो कि क्या उन्हें इस परेशानी का केवल इसलिए सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उनके नाम के साथ ‘खान’ जुड़ा हुआ है.

यह दूसरी बार है जब शाहरुख खान के साथ अमरीका में ऐसा हुआ है और अमरीकी अधिकारियों के कामकाज के ढंग पर सवाल उठ रहे हैं.

लेकिन इस सारी बहस के दो पहलूओं पर ध्यान देने की जरुरत है.

'ऐसा लगता है कि गिरफ्तार कर लिया'

नाम और समुदाय के आधार पर प्रोफाइलिंग का निशाना बनने वाले शाहरुख खान अकेले नहीं हैं. अमरीका के हवाई अड्डे पर रोजाना अनेक लोगों के साथ ऐसा होता है.

आगंतुकों से तरह-तरह के सवाल किए जाते हैं और यह लोग अपमानित होने के एहसास के साथ विवश होकर रह जाते हैं.

ऐसे ही एक व्यक्ति आंध्र प्रदेश के मोहम्मद जफर पिछले 20 वर्षों से अमरीका में रहते हैं.

जफर का कहना है कि पहले वो स्वतंत्र होकर कहीं भी आते जाते थे, लेकिन अमरीका में 9/11 की घटना के बाद उनके लिए भी सब कुछ बदल गया.

उन्होंने कहा, "9/11 की घटना के बाद जब भी मैं हैदराबाद से अमरीका आता हूं तो एयरपोर्ट पर अमरीकी अधिकारी रोकते हैं और पूछताछ के बाद ही जाने देते हैं. कई बार तो ऐसा हुआ की मेरी पत्नी और बच्चों को तो जाने दिया लेकिन मुझे रोक लिया क्योंकि मेरा नाम मोहम्मद है."

जफर के अनुसार अगर किसी यात्री के नाम को देख कर इम्मीग्रेशन अधिकारी को संदेह होता है तो वो उसका पासपोर्ट एक प्लास्टिक बैग में रख देता है और उसे कतार से अलग करके एक कमरे में पहुंचा दिया जाता है.

जफर ने कहा, "उस समय आप खुद को बुरी तरह अपमानित महसूस करते हैं क्योंकि आपको सैंकड़ों लोग देख रहे होते हैं और हर कोई यही कहता है कि शायद ये कोई आतंकवादी है जिसे अधिकारी पकड़ कर ले जा रहे हैं."

उनका कहना है कि उस कमरे में सैकड़ों अन्य लोग होते हैं जिनसे अमरीकी अधिकारी एक के बाद एक सवाल करते हैं.

जफर ने कहा, "वहां आप को लगता है कि आपको गिरफ्तार कर लिया गया है. अपमानजनक सवाल किए जाते हैं. आपके फिंगर प्रिंट लिए जाते हैं और अगर आप शौच के लिए भी जाना चाहते है तब भी कोई सुरक्षाकर्मी आपके साथ आता है. अगर आप खुशनसीब हैं तो शायद पंद्रह बीस मिनट में छूट सकते है नहीं तो चार-पांच घंटे भी लग सकते हैं".

हैदराबाद में ही रहने वाले अयूब खान और मोहम्मद अजमत भी अमरीका में इस तरह की जांच के शिकार हो चुके है. इन दोनों हैदराबादी युवाओं को 9/11 के दूसरे ही दिन संदेह होने पर गिरफ्तार कर लिया गया था.

वो दो वर्षों तक जेल में बंद रहे और उसके बाद उन्हें अमेरिका से निकाल दिया गया.

भारत में भी दुर्व्यवहार

सुरक्षा बलों के व्यवहार और रवैए का दूसरा पक्ष भारत से संबंध रखता है.

अमरीकी अधिकारी कहते हैं कि वे वहाँ के कानून और नीयमों के अनुसार चलते हैं.

लेकिन भारत में भी कानून के उल्लंघन और नागरिकों को समुदाय विशेष के सदस्य होने के कारण यातनाएँ दिए जाने के कई उदाहरण हैं.

डॉक्टर इब्राहीम जुनैद, रईस अहमद, अरशद खान और मुस्तफा अली जैसे कई युवा हैं जिन्हें हैदराबाद की मक्का मस्जिद में साल 2007 में हुए विस्फोट के बाद गिरफ्तार किया गया था.

उन्होंने सुरक्षा सेवाओं पर आरोप लगाए कि उन्हें गुप्त स्थानों पर रख कर यातनाएँ दी गईं और कई मामलों में उलझाकर दो-दो साल तक जेल में रखा गया.

इब्राहीम जुनैद कहते हैं, "ये एक ऐसा अपमान था जिसने शरीर के साथ-साथ हमारी आत्मा और दिल पर भी गहरा घाव लगाया. हम इस देश के नागरिक हैं, लेकिन पुलिस का व्यवहार ऐसा था जैसा दुश्मनों के साथ होता है. वो जो कुछ कहते थे उससे साफ जाहिर था कि हमें केवल मुसलमान होने के करण इस तरह निशाना बनाया गया.”

रईस अहमद का अनुभव भी कुछ ऐसा ही था.

उन्होंने कहा, "वो हमसे कहते थे कि अगर तुम अपने खिलाफ लगाए गए आरोप स्वीकार नहीं करोगे तो एनकाउंटर तक हो सकता है."

बाद में इस मामले में आंध्र प्रदेश की सरकार ने गलती मानते हुए पुलिस के जुल्मों का शिकार बने युवाओं को रिहा किया और तीन-तीन लाख रूपए का मुआवजा भी दिया.

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