जनसंहार हुआ, लेकिन किया किसी ने नहीं

बथानी टोला पर प्रदर्शन
Image caption बथानी टोला नरसंहार मामले में फैसला आने के बाद पुलिस की कोताही का विरोध करते लोग.

बिहार के बथानी टोला जनसंहार मामले में निचली अदालत द्वारा सज़ा प्राप्त सभी 23 अभियुक्तों को पटना हाई कोर्ट द्वारा बरी किए जाने पर तीखी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की जा रही हैं.

सज़ामुक्त किए जाने संबंधी अदालती फ़ैसले में पुलिस को अपराध साबित करने लायक साक्ष्य नहीं जुटा पाने और जांच में लापरवाही बरतने का दोषी ठहराया गया है.

यही कारण है कि मामले की जाँच या अभियोजन से जुड़े पुलिस महकमे के ख़िलाफ़ मंगलवार को राज्य के कई हिस्सों में रोषपूर्ण विरोध प्रदर्शन किए गए.

ख़ासकर भाकपा-माले नामक वामपंथी दल से जुड़े कार्यकर्ताओं ने आरा और पटना में सड़कों पर निकलकर पुलिस -प्रशासन और नीतीश सरकार के ख़िलाफ़ नारे लगाए.

भोजपुर ज़िले के सहार अंचल अंतर्गत बथानी टोला गाँव में लगभग सोलह साल पहले इक्कीस लोगों की हत्या कर दी गई थी. मारे गए लोगों में ग़रीब दलित और मुस्लिम परिवारों की औरतें और बच्चे भी शामिल थे.

उस समय 'रणवीर सेना' नाम के प्रतिबंधित संगठन से जुड़े उच्च जाति-वर्ग के लोगों को इस नरसंहार में शामिल माना गया था.

पुलिस पर कोताही का आरोप

पटना में प्रतिरोध जुलूस का नेतृत्व कर रहे जनवादी लेखक-पत्रकार रामजी राय ने कहा, ''साफ़ ज़ाहिर है कि इस जघन्य नरसंहार में लिप्त लोगों को बचाने के लिए पुलिस ने जांच और सबूत के मामले में बेईमानी बरती. साथ ही मौजूदा शासन तंत्र की जनघाती मंशा और न्याय पर भारी अन्याय का भी सबूत सामने आ गया है.''

पटना हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा भी है, ''दुख है कि इतने नृशंस हत्याकांड की जांच सही दिशा में या सचाई के साथ नहीं की गई, और संदेह से परे साक्ष्य सामने नहीं लाये गये. इसलिए ठोस सबूतों के अभाव में इस तरह का फ़ैसला अदालत को विवश होकर लेना पड़ा है.''

बथानी टोला नरसंहार में जो अभियुक्त बनाये गये, उनमें से तीन को उम्र क़ैद और अन्य बीस को आजीवन कारावास की सज़ा आरा की एक निचली अदालत ने सुनाई थी.

'खूनी संघर्ष'

उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ पटना हाई कोर्ट में की गई अपील पर सुनवाई के बाद सोमवार ( 16 अप्रैल ) को जो निर्णय आया, उसमें सभी तेईस अभियुक्तों को बरी कर दिया गया.

जिस समय यह नरसंहार हुआ था, उस समय मध्य बिहार, ख़ासकर भोजपुर, जहानाबाद और औरंगाबाद ज़िलों में नक्सली संगठनों और ' रणवीर सेना ' के बीच ख़ूनी संघर्ष का सिलसिला जारी था.

जातीय हिंसा के उस दौर में बिहार में कई बड़े नरसंहार हुए थे. लेकिन बाद में, यानी अब से दस साल पहले ही बिहार में हिंसा का ये दौर थम गया क्योंकि सम्बंधित संगठन या तो बिखर गये, या कमज़ोर पड़ गये.

अब इस ताज़ा अदालती फ़ैसले ने पुलिस-जांच और क़ानूनी प्रक्रिया के संदर्भ में न्याय की स्थिति को ही चिंतनीय बना दिया है.

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