'बालिका वधू' बनने की सज़ा

बाल-विवाह
Image caption भारत में बाल-विवाह कानूनी जुर्म है.

अगर किसी लड़की का ऐसी उम्र में विवाह हो जाए जो बाल विवाह के दायरे में आता हो तो उसके जीवन में कई तरह के मो़ड़ आ सकते हैं और एक वो फ़ैसला जो उसके माँ-बाप ने लिया था उस लड़की पर भारी पड़ सकता है.

ये कहानी है मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले की रत्ना राशि की जो पांच बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी थी इसलिए 14 साल की कच्ची उम्र में ही ब्याह दी गई. सिर पर नई जिम्मेदारियों का बोझ पड़ा और शुरू हुआ मुश्किलों से भरा सफर.

इस बीच उन्होंने शादी के बाद बीएससी किया और फिर इतिहास में एमए.

रत्ना राशि कहती हैं,''मुझे शादी के कुछ दिनों बाद ही पता चल गया कि मेरे पति दिमागी तौर पर अक्षम हैं लेकिन जैसे-तैसे समय काटा. इस दौरान मेरे दो बच्चे हुए और मैंने निजी स्कूल में नौकरी करनी शुरू की. पति का इलाज भी करवाया लेकिन काफी साल निभाने के बाद लगा कि अब शादी को निभाना संभव नहीं है इसलिए 13 साल बाद मैंने तलाक ले लिया.''

रत्ना राशि के लिए जद्दोजहद का सफर यहीं समाप्त नहीं हुआ लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी क्योंकि सामने दो बच्चों को पालने का सवाल था.

उन्होंने साल 2008 में मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग की आरंभिक परीक्षा दी. वो पास भी हो गईं.

उम्मीदों की पतंग ने उड़ान भरनी शुरू की लेकिन उस समय एक झटका लगा जब राज्य लोकसेवा आयोग ने मुख्य परीक्षा के लिए उनके फॉर्म को खारिज कर दिया.

कानूनी लड़ाई

रत्ना राशि ने बताया कि चूंकि उनकी 18 साल से कम उम्र में शादी हुई थी इसी को आयोग ने फॉर्म को खारिज करने का आधार बताया और आयोग ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया.

लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा और शुरुआत हुई उनके जीवन में कानूनी लड़ाई की.

दरअसल मध्य प्रदेश में कानून में संशोधन कर साल 2005 में नियम 6(5) जोड़ा गया था. इसके अनुसार कोई भी उम्मीदवार जिसकी शादी आधिकारिक उम्र से कम में हुई है वो सरकारी सेवा या किसी पद पर रहने के योग्य नहीं है.

कानून के अनुसार शादी के लिए लड़कियों की आधिकारिक उम्र 18 और लड़कों की 21 तय की गई है.

रत्ना राशि ने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी. हाई कोर्ट ने अंतरिम फैसले में उन्हें परीक्षा तो देने दी लेकिन आगे आदेश देने तक परिणामों पर रोक लगा दी.

इसके बाद रत्ना राशि ने 2010 में मुख्य परीक्षा दी लेकिन नतीजा नहीं आया है.

इस साल फरवरी महीने में हाईकोर्ट ने इस मामले में अंतिम फैसला सुनाते हुए रत्ना राशि को अयोग्य करार दिया.

रत्ना राशि ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और अदालत ने अपने अंतरिम फैसले में आयोग से कहा है कि जब तक परीक्षा के नतीजे नहीं आ जाते तब तक आयोग एक सीट खाली रखे.

फ़िलहाल रत्ना राशि एक ऐसी लड़ाई लड़ रही है, जिसमें वह अपने माता-पिता की ग़लती से झोंक दी गईं थीं.

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