गुलाम या बंधुआ नहीं हूं: कबीर सुमन

Image caption तृणमूल कांग्रेस के सांसद कबीर सुमन ने ममता बनर्जी के विरोध में एक गाना ही लिख दिया

पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि उसने कथित रूप से उन लोगों पर नकेल कसने की कोशिश की है जिन्होंने सोशल मीडिया के सहारे सरकार पर मजाकिया टिप्पणी की है.

दूसरी पार्टियां तृणमूल कांग्रेस की आलोचना करती हैं तो बात समझ आती है. लेकिन खुद तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद कबीर सुमन ने इस मामले में अपनी ही पार्टी पर निशाना साधा है.

बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी से एक खास बातचीत में कबीर सुमन ने राजनीति और इसके दूसरे पहलुओं पर बेबाक तरीके से अपनी बात रखी.

उन्होंने कहा, ''पश्चिम बंगाल में जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं और राजनीति में होने के नाते मैंने अपने अनुभव से जो कुछ सीखा है, वो ये है कि जिस व्यक्ति में आत्म-सम्मान की भावना है, वो किसी भी राजनीतिक दल के साथ, खासतौर पर तृणमूल कांग्रेस के साथ नहीं रह सकता."

वे कहते हैं, ''ममता बनर्जी में संभावनाएं हैं, वे एक महान नेता हैं, वे लोगों को प्रेरित कर सकती हैं, उनमें कई अच्छी बातें हैं, उनके पास मजबूत व्यक्तित्व है, लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि लोगों को सम्मान किस तरह दिया जाता है.''

ये पूछे जाने पर कि वे अपनी ही पार्टी की नेता की आलोचना क्यों कर रहे हैं, कबीर सुमन ने कहा, ''मेरे पास आलोचना करने की वजह है. मैं सांसद नहीं बनना चाहता था. लेकिन सबने कहा कि दादा तुम्हें संसद में जाना चाहिए ताकि पश्चिम बंगाल के उन लोगों की बात की जा सके जो सबसे निचले स्तर पर हैं, ताकि राज्य के पर्यावरण और तमाम मुद्दों को उठाया जा सके.''

'गुलाम या बंधुआ मजदूर नहीं'

वे अपने अनुभव बताते हुए कहते हैं, ''जब मैं संसद पहुंचा तो मैंने पाया कि ममता बनर्जी ये तय करती हैं कि किसे क्या बोलना है. मेरे पास कोई आजादी ही नहीं है. पार्टी व्हिप में जो कहा गया है, आपको वही करना है. यदि आप नहीं मानते तो आप गए.''

ममता बनर्जी को केंद्र में रखकर कुछ कार्टून बनाने और उन्हें इंटरनेट पर जारी करने वाले एक प्रोफेसर के बारे में पूछे जाने पर कबीर सुमन ने कहा, ''मैं तो इसे कला का एक नमूना ही कहूंगा. प्रोफेसर के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पूरी तरह से गलत है. ये तो एकदम तानाशाही है.''

ये पूछे जाने पर कि जिस तरह के बयान वो दे रहे हैं, क्या उसकी वजह से उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, कबीर सुमन ने कहा, ''बेशक, मैं खुद ममता बनर्जी से कई बार कह चुका हूं कि मुझे पार्टी से बाहर निकाल दो, मैं पार्टी में नहीं रहना चाहता.''

कबीर सुमन इसकी वजह भी बताते हैं. वे कहते हैं, ''ममता बनर्जी ऐसा नहीं करती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि जैसे ही वो मुझे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाएंगी, मैं एक निर्दलीय सांसद बन जाऊंगा जो उनके लिए खतरनाक हो सकता है. मैं भारत में किसी राजनीतिक दल या नेता का गुलाम या बंधुआ मजदूर नहीं हूं.''

उन्होंने कहा, "सीपीएम के ख़िलाफ़ चुनाव जीतकर मैंने कोई अपना गला काटकर चांदी की थाल में सजाकर ममता बनर्जी के सामने पेश नहीं किया है."

ममता और माओवादी

ये पूछे जाने पर कि वे खुद ही क्यों तृणमूल कांग्रेस नहीं छोड़ देते, कबीर सुमन ने कहा, ''मैं ऐसा क्यूं करूं, मुझे पार्टी का सदस्य उन्होंने बनाया, मैं तो सदस्य बनना नहीं चाहता था, मैं तो टिकट नहीं चाहता था. मैं जो कुछ कर रहा हूं, वो मेरे संवैधानिक अधिकारों के दायरे में है. मैं कुछ गलत नहीं कर रहा हूं. तमाम बातों के बावजूद मैं फिर भी उनका सम्मान करता हूं.''

जब आप ममता बनर्जी की राजनीति से सहमत नहीं हैं तो उनका समर्थन क्यों कर रहे हैं?

ये पूछे जाने पर कबीर सुमन कहते हैं, ''मैं उनका समर्थन करता हूं क्योंकि मुझे उनमें पहले कई खूबियां नजर आई थीं, विपक्षी नेता के तौर पर वे एक जोरदार नेता हैं. जब हम साथ मिलकर लड़ रहे थे, तब वो बड़ी लोकतांत्रिक नेता थीं. माओवादियों ने ममता बनर्जी का समर्थन किया लेकिन जब कोटेश्वर राव को मार गिराया गया तो मुझे बड़ा बुरा लगा.''

किशन जी को 'शहीद' बताने पर कबीर सुमन से जब ये पूछा गया कि क्या वे एक बागी माओवादी है, उन्होंने कहा, ''मैं तो कम्युनिस्ट भी नहीं हूं, मैं अनिश्वरवादी हूं, मैं महात्मा गांधी की तरह हूं जिन्होंने कहा था कि आजादी मिलने के बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए. सैद्धांतिक तौर पर मैं मार्क्सवादी हूं.

वे कहते हैं, ''लेकिन मैं माओवादियों और नक्सलियों का उसी तरह सम्मान करता हूं, जिस तरह से खुदीराम बोस और भगत सिंह, जिन्होंने कुछ सिद्धातों की खातिर अपनी जान दे दी. कितने नेता हैं जो अपनी जान की कुर्बानी देते हैं.''

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