दलाई लामा की चुप्पी से उठते सवाल

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Image caption भारत में प्रदर्शन करते तिब्बती

चीन सरकार के खिलाफ तिब्बत में लगातार होने वाली आत्मदाह की घटनाओं ने न सिर्फ धर्म गुरु दलाई लामा के प्रति निर्वासित तिब्बतियों की आस्था को हिला कर रख दिया है, बल्कि अहिंसा से भी इन लोगों का विश्वास धीरे-धीरे उठने लगा है.

हालांकि 76 वर्षीय दलाई लामा राजनीतिक नेता के तौर पर खुद के अवकाश लेने की घोषणा कर चुके हैं लेकिन करीब 50 लाख तिब्बतियों के धर्म गुरु के तौर पर अब भी वे बने हुए हैं.

हाल के दिनों में करीब 32 तिब्बतियों के आत्मदाह के बावजूद उनकी चुप्पी हैरान करने वाली है.

इस बारे में उनका जवाब बहुत ही औपचारिकता पूर्ण है, “अब ये बहुत ही बड़ा संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन गया है.”

उनका कहना है, “यदि मैं इसमें शामिल रहता हूं तो मेरा राजनीतिक जीवन से अवकाश लेने का कोई मतलब नहीं रह जाता. मैं जो कुछ भी कहूंगा, चीन सरकार अपने हिसाब से उसका अर्थ निकाल लेगी.”

पचास साल से भी ज्यादा समय से दलाई लामा मध्यम मार्ग की नीति का अनुसरण कर रहे हैं. चीन सरकार के साथ बातचीत के दौरान वे हमेशा अहिंसा की बात करते हैं.

लेकिन वे खुद स्वीकार करते हैं कि ये सब सिर्फ समय की बर्बादी है. पिछले दो साल से चीन के साथ उनकी कोई बातचीत नहीं हुई है.

वे कहते हैं, “चीनी नेता बहुत ही मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता के हैं. वे सिर्फ अपने मुँह का इस्तेमाल करते हैं किसी और की बात नहीं सुनते हैं. जहां तक उनकी सरकार का संबंध है, वो सच में बहुत ही कठोर है. वो यह बिल्कुल नहीं समझती कि तिब्बतियों की वास्तविक भावना क्या है.”

पिछले 20 साल के दौरान मैं कई बार उनका साक्षात्कार कर चुका हूँ, लेकिन इतने गुस्से में इससे पहले उन्हें कभी नहीं देखा.

आस्था

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Image caption तिब्बती भिक्षुओं में आत्मदाह की घटनाएं काफी बढ़ी हैं

दशकों से दलाई लामा अपने समर्थकों के लिए भगवान का रूप रहे हैं. उनकी या उनकी नीतियों की आलोचना ईश-निंदा जैसी होती है. लेकिन अब ऐसा नहीं है.

तिब्बती युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष 60 वर्षीय ल्हासांग त्सेरिंग कहते हैं, “मैं वास्तविकता से मुँह चुराने की उनकी मौजूदा नीति और स्थिति पर सवाल पूछता हूं कि क्यों तिब्बती लोगों को आत्महत्या के लिए मजबूर किया जा रहा है.”

निर्वासित तिब्बती संसद के पूर्व सदस्य कर्मा चोफेल चेतावनी देते हैं, “अहिंसा अब बेमानी हो गई है. अब तो सिर्फ हिंसा के जरिए ही कुछ हासिल हो सकता है.”

चीन के सिचुआन प्रांत के एक तिब्बती नागरिक नॉर्बूू भारत में शरण पाने के लिए पूरे हिमालय की यात्रा करके आते हैं.

वे कहते हैं, “मुझे यहां आना था. ताकि पूरी दुनिया को बता सकूं कि क्या हो रहा है.”

नॉर्बू बताते हैं, “मैं अबा शहर में खरीदारी कर रहा था, तभी अचानक दो भिक्षु आग लगाकर दौड़ते हुए आए. एक ने अपने हाथ में तिब्बती झंडा लिया था और धर्म की आजादी और दलाई लामा की वापसी संबंधी नारा लगा रहा था. कुछ ही मिनट बाद पुलिस, और सैनिक वहां पहुंचे और उन दोनों भिक्षुओं को ट्रक में लादकर ले गए. पता नहीं वे मर गए या जिंदा हैं.”

नॉर्बू ने जिस घटना का जिक्र किया वो पिछले साल सितंबर महीने में घटी थी. ये दोनों भिक्षु 18 साल के थे.

नॉर्बू के गुस्से को देखते हुए मैंने उससे पूछा कि इन सबके बावजूद वो अभी तक सिचुआन प्रांत में क्यों पड़े रहे.

इस बारे में उसका जवाब था कि कीर्ति मॉनेस्ट्री के चारों ओर सेना के तीन शिविर हैं. सुरक्षा बल और सादे कपड़ों में पुलिस हर जगह मौजूद रहती है. हर सड़क पर चेकप्वाइंट्स बने हुए हैं.

यही नहीं, इन इलाकों में इंटरनेट कैफे बंद कर दिए गए हैं और सार्वजनिक टेलीफोन कार्यालय भी बंद रहते हैं.

चीनी अधिकारी बाहर से आने वाले हर व्यक्ति पर नजर रखते हैं. उनका मानना है कि वे तिब्बती लोगों के विकास के लिए काम कर रहे हैं और दलाई लामा जैसे बाहरी लोग आकर उन्हें भड़काते हैं.

इंटरनेट

वहां जो कुछ भी हो रहा है उसे जानने का एकमात्र साधन यू ट्यूब पर दिखने वाले वीडियो हैं.

पत्रकारों के लिए किसी भी जानकारी के लिए भारत में धर्मशाला में आना होता है जहां करीब डेढ़ लाख तिब्बती दलाई लामा के साथ निर्वासित जीवन जी रहे हैं.

मैं जैसे ही धर्मशाला में एक मठ में पहुंचा, वहां आत्मदाह की एक अन्य घटना हुई थी और लोग काम कर रहे थे.

19 वर्षीय लोबसांग त्सुलतरिम के पास मोबाइल फोन था और वह कंप्यूटर के की बोर्ड पर तेजी से टाइप कर रहा था.

वो पूछ रहा था, “क्या हुआ? क्या वह नारे लगा रहा था?” सारी जानकारी लेकर वह तिब्बत समर्थक समूहों और पत्रकारों को देता है.

वो कहता है, “हाल के दिनों की आत्मदाह की घटनाएं न सिर्फ भिक्षुओं की खुद की पीड़ा को दिखाती हैं बल्कि पूरे तिब्बती समुदाय की पीड़ा इसमें दिखती है. ”

माओ ने कहा था, “यदि दमन होगा तो लोग विद्रोह करेंगे.”

धर्मशाला के दफ्तर में तिब्बती युवा कांग्रेस के मौजूदा महासचिव तेनजिन चोके कंप्यूटर के सामने बैठे हैं और तिब्बत से मिल रही तस्वीरों को देख रहे हैं.

उसी शाम धर्मशाला में एक और आत्मदाह की खबर पहुंचती है. लोग सड़कों पर कैंडल मार्च के लिए निकल पड़ते हैं.

दलाई लामा और उनकी टीम के लिए ये आम बात हो गई है जो कि लंबे समय से यही बहस कर रहे हैं कि उनके लोगों को किस दिशा में जाना चाहिए.

पर अब तो यही सच है कि तिब्बत में रह रहे तिब्बती अपनी जान दे रहे हैं और निर्वासन में रह रहे लोग सिर्फ मोमबत्ती मार्च और प्रार्थना के जरिए अपनी प्रतिक्रिया भर दे सकते हैं.

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