भारत आना घर वापसी जैसा: बान की-मून

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मैं यहाँ आकर बहुत खुश हूँ- इन पंक्तियों से शुरू किए अपने भाषण में संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून ने न सिर्फ छात्रों से भरे सभागार में तालियाँ बटोरीं बल्कि उनके दिल भी जीत लिए.

मौका था दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के विशेष दीक्षांत समारोह का, जहाँ उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी गई.

इस मौके पर अपनी खुशी व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, "वर्षों से मैं इस देश का विद्यार्थी रहा हूँ. मैंने इसे समझने और जानने की कोशिश की है. आज जाकर मुझे इसकी डिग्री भी मिल गई है. यह मेरे और संयुक्त राष्ट्र के लिए बड़ा पुरस्कार है और मैं इस डिग्री को संयुक्त राष्ट्र में काम करने वाले हजारों लोगों की प्रतिष्ठा में स्वीकार करता हूँ."

भारत से अपने निकट संबंधों में उन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों को याद किया. चालीस साल पहले उन्होंने अपने कूटनीतिक करियर की शुरुआत भारत से ही की थी और यह उनकी जिंदगी का अहम पड़ाव था.

रिश्ता

बान की-मून ने कहा, "भारत से मेरा जुड़ाव बहुत प्रगाढ़ है. यहाँ मेरे बेटे का जन्म हुआ. कुछ सालों बाद मेरी बेटी ने एक भारतीय से ही विवाह किया. मेरे पोते का नाम जय है और ये दो देशों के बीच किसी 'साझा उपक्रम' की सबसे सुंदर मिसाल है.

भारत से अपने संबंधों की प्रगाढ़ता के बारे में उन्होंने और भी प्रसंग याद किए और इन्ही वजहों से उन्हें भारत आना घर वापसी जैसा लगता है.

भारत से परिवार जैसे घनिष्ठ संबंधो पर उन्होंने कहा, "भारत मेरे जीवन में पारिवारिक भूमिका अदा करता है, ऐसा ही कुछ किरदार भारत दुनिया के परिवार में निभा रहा है. प्रजातंत्र और विकास के क्षेत्र में भारत आज दुनिया में आदर्श माना जाता है. यह दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है और विश्व में बड़ी आर्थिक शक्ति बनने का मार्ग प्रशस्त कर रहा है."

दक्षिण कोरिया में बिताए अपने बचपन के मुश्किल दिनों को भी उन्होंने याद किया.

योगदान

ऊर्जा संकट पर उन्होंने कहा कि बचपन में बिजली गुल होने का मतलब ही नहीं पता था, क्योंकि उन दिनों ऊर्जा नहीं होती थी और उन्होंने रात में दीये जलाकर पढाई पूरी की.

आज दुनिया अलग धुरी पर घूम रही है और ऊर्जा संकट एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है जिसका आने वाली पीढ़ियों के लिए हल निकलना जरूरी है. यहाँ उन्होंने गाँधी को याद करते हुए बोला - शांतिपूर्ण तरीके से आप दुनिया को हिला सकते हैं.

उत्साह से सुन रहे छात्रों को बान की-मून ने संबोधित करते हुए कहा कि आज वे विश्व के नागरिक हैं और आज की पीढ़ी 'संयुक्त राष्ट्र पीढ़ी' है, जो विश्व शांति और विकास में अहम योगदान देगी.

भाषण के अंत में उन्होंने रबींद्रनाथ ठाकुर की कुछ पंक्तियाँ याद की- मैं सोया और सपना देखा कि जीवन कितना आनंददायक है. जब जगा तो पाया कि जीवन दरअसल सेवा है. मैंने इस पर अमल किया और पाया कि सेवा ही आनंद है.

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