तहलका प्रकरण: कब, क्या हुआ?

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Image caption बंगारू लक्ष्मण को चार साल की कैद की सजा सुनाई गई है

साल 2001 के मार्च महीने की 13 तारीख को अचानक दिल्ली की राजनीति उस वक्त गरमा गई थी जब फर्जी रक्षा सौदे के स्टिंग ऑपरेशन का वीडियो एक संवाददाता सम्मेलन में दिखाया गया.

खुफिया कैमरे में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण रक्षा सौदे के फर्जी एजेंट से एक लाख रुपए लेते दिखाई दिए थे.

करीब ग्यारह साल बाद अदालत ने इस मामले में बंगारू लक्ष्मण को दोषी ठहराते हुए उन्हें चार साल की सजा सुनाई है.

आइए जानते हैं, इस पूरे मामले में कब क्या हुआ--

23 दिसंबर 2000 से लेकर 7 जनवरी 2001 के बीच वेबसाइट तहलका के पत्रकारों ने हथियारों के सौदागर बनकर भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण के साथ आठ बार मुलाकात की.

5 जनवरी 2001 को बंगारू लक्ष्मण ने हथियारों के फर्जी दलाल से एक लाख रुपये की रिश्वत लेना स्वीकार किया.

13 मार्च 2001 को तहलका ने इस पूरे स्टिंग ऑपरेशन की सीडी ऑपरेशन वेस्टएंड के नाम से पत्रकार वार्ता में जारी की.

इस मामले ने राजनीतिक जगत में भूचाल मचा दिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश के. वेंकटस्वामी की अध्यक्षता में एक जांच आयोग गठित किया.

लेकिन वर्ष 2003 में वेंकटस्वामी ने इस आयोग से इस्तीफा दे दिया. उसके बाद मार्च 2003 में न्यायमूर्ति एस एन फूकन आयोग बना.

इस आयोग ने पहली रिपोर्ट में जॉर्ज फर्नांडीस को क्लीन चिट दी, लेकिन आयोग की अंतिम रिपोर्ट आने से पहले ही साल 2004 में यूपीए सरकार ने फूकन आयोग का काम सीबीआई को सौंप दिया.

6 दिसंबर 2004 को सीबीआई ने बंगारू लक्ष्मण समेत पांच लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत कई धाराओं में मामला दर्ज किया.

6 जुलाई 2006 को सीबीआई ने बंगारू लक्ष्मण के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया.

2 अप्रैल 2012 को दिल्ली की अदालत ने इस मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया.

27 अप्रैल 2012 को दिल्ली स्थित निचली अदालत ने बंगारू लक्ष्मण को मामले में दोषी करार दिया.

28 अप्रैल 2012 को अदालत ने बंगारू लक्ष्मण को चार साल की सजा और एक लाख रुपये जुर्माना अदा करने को कहा है.

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