यूपी में 'मूर्ति घोटाला', आपराधिक मामला दर्ज

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Image caption अभी पुलिस इस बारे में कुछ नहीं कह रही है कि ये घोटाला कितना बड़ा हो सकता है

लखनऊ पुलिस ने पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में पार्कों में हाथी की मूर्तियां लगाने से जुड़े कथित घोटाले के मामले में आपराधिक मामला दर्ज किया है.

मामले का दायरा बड़ा होने के कारण उसकी जांच सीआईडी की आर्थिक अपराध शाखा को दी जा रही है.

हाथी की मूर्तियां बनाने वाले एक गरीब कारीगर की शिकायत पर यह मामला दर्ज किया गया है.

आरोप है कि सरकारी खजाने से हाथियों की असली कीमत से कई गुना ऊंची कीमत वसूली गई, जबकि कारीगर को बहुत काम पैसा दिया गया.

पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपने पांच साल के कार्यकाल में लखनऊ और नोएडा में दलित वर्ग का स्वाभिमान बढ़ाने के लिए जानी-मानी हस्तियों के नाम पर स्मारक और पार्क बनवाए.

पत्रकारों ने मायावती सरकार के तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी से इस बारे में सवाल किए हैं लेकिन उन्होंने टाल-मटोल करते हुए कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है.

'नहीं मिले पूरे पैसे'

मायावती ने इन स्मारकों में अपनी मूर्तियों के अलावा बड़ी संख्या मे पत्थर के हाथी लगवाए. इनका निर्माण राजकीय निर्माण निगम के माध्यम से कराया गया.

अब मायावती सरकार के सत्ता से हटने के बाद मूर्तियों के एक कारीगर आगरा निवासी मदन लाल ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि राजकीय निर्माण निगम के ठेकदार आदित्य अग्रवाल ने उन्हें हाथी की मूर्तियां बनाने का पूरा पैसा नही दिया.

मदन लाल के अनुसार 48 लाख का वादा करके उन्हें सिर्फ साढ़े सात लाख रुपए दिए गए.

मदन लाल का आरोप है कि पैसा मांगने पर उन्हें धमकी दी जाती है.

लखनऊ पुलिस ने मूर्तिकार मदन लाल की शिकायत पर आदित्य अग्रवाल के गोदाम पर छापा मारकर पत्थर का एक हाथी और 68 लाख रुपए नकद बरामद कर लिए.

पुलिस ने आदित्य अग्रवाल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

'सरकारी पैसे का दुरूपयोग'

इसके बाद पुलिस ने राजकीय निर्माण निगम के दफ्तर में छानबीन की. इस छानबीन में पाया गया कि निर्माण निगम ने हाथी की मूर्तियां बनाने के टेंडर देने में काफी गड़बड़ी की.

Image caption मायावती ने दलित महापुरूषों के साथ साथ अपनी भी मूर्तियां लगवाईं.

हाथी की एक मूर्ति पर लगभग सवा चार लाख रुपये की लागत आई, जबकि पॉलिश और धुलाई आदि के नाम पर सरकारी खजाने से प्रति हाथी लगभग साठ लाख रुपये वसूले गए.

पुलिस का कहना है कि पत्थर के हाथी और अन्य निर्माण कार्यों के लिए टेंडर और ठेका देने की पूरी प्रक्रिया दोषपूर्ण है और इसमें भारी भ्रष्टाचार हुआ है.

लखनऊ के पुलिस उप-महानिरीक्षक आशुतोष पांडेय का कहना है, "ये गड़बड़ी केवल हाथी की मूर्तियों के निर्माण तक सीमित नही है, बल्कि ये एक बड़ा घोटाला है. इसलिए इसकी जांच सीआईडी की आर्थिक अपराध शाखा से कराने की सिफारिश की गई है."

पाण्डेय ने कहा, “इसमें ठेकेदार और अधिकारियों की सांठगांठ है, जो नियमों को ताक पर रखकर सरकारी पैसे का दुरुपयोग किया गया. यह भ्रष्टाचार का मामला है.”

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Image caption अखिलेश यादव सरकार मामले की पूरी जांच का भरोसा दिला रही है.

एक अनुमान के अनुसार छोटे बड़े करीब 500 पत्थर के हाथी बनवाए गए. लेकिन लखनऊ पुलिस अभी यह नही बता पा रही है कि इस घोटाले में सरकारी खजाने को कितना नुकसान हुआ.

पाण्डेय ने बताया कि ठेके की प्रक्रिया में शामिल राजकीय निर्माण निगम के पांच बड़े अधिकारियों के पासपोर्ट जब्त करने की सिफारिश की गई है ताकि वे जांच के दौरान देश के बाहर न चले जाएं.

मंत्री का मायावती पर गंभीर आरोप

इस बीच लोक निर्माण मंत्री शिव पाल सिंह यादव ने कहा है कि पार्कों में हाथी लगाने के इस घोटाले का कमीशन ऊपर तक जाता था.

उनका आरोप है, “सीधा सीधा इसमें बड़े पैमाने पर कमीशनखोरी हुई है. उसका हिस्सा पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के पास भी गया...पूर्व मंत्रियों के पास गया और इसमें कुछ अधिकारी भी मिले हैं. इसकी पूरी जांच होगी क्योंकि यह पैसा जनता का था और विकास कार्यों के लिए था.”

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के मुताबिक घोटाला हजारों करोड़ रुपयों में है और इसकी पूरी जांच कराई जाएगी.

पुलिस महानिदेशक एसी शर्मा ने कहा है अगर लखनऊ पुलिस आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा से जांच के लिए सिफारिश भेजेगी तो उस पर विचार किया जाएगा.

इससे निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि अखिलेश यादव सरकार जल्द ही इस मामले को सीआईडी की अपराध शाखा को सौंप देगी.

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