अब खजूर में अटकी मायावती

Image caption बसपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नई सरकार इन पेड़ों की देखभाल नहीं कर पाई इसलिए ये हाल हुआ है.

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को अब अपने स्मारकों के लिए खजूर के पेड़ खरीदने के मामले में भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच का सामना करना पड़ सकता है.

आरोप है कि हजारों की तादाद में खजूर के पेड़ मंहगे दाम पर विदेशों से आयात किए गए लेकिन इनमे से अधिकाँश पेड़ सूख गए.

बहुजन समाज पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने इन आरोपों को बिलकुल गलत बताया कि विदेशों से मंहगे दाम पर खजूर के पेड़ आयात किये गए.

मौर्या ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव सरकार इन पेड़ों का रखरखाव ठीक से नही कर रही है , इसलिए ये खजूर के पेड़ सूख रहें हैं.

'सैंकड़ों पेड़ सूखे पड़े हैं'

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हाल ही में पत्रकारों का ध्यान इस ओर खींचा कि जियामऊ गाँव में सैकड़ों की तादाद में खजूर के सूखे पेड़ पड़े हैं. इसके अलावा कई तालाबों में भी खजूर के पेड़ दबा दिए गए हैं.

जियामऊ गाँव मुख्यमंत्री बंगले और अम्बेडकर स्मारक के बीच में है और ये सूखे खजूर के पेड़ सड़क से आते- जाते दिखाई देते हैं.

यादव का कहना है कि मायावती सरकार ने लखनऊ और नोएडा में स्मारक बनाने में जमीनों के अलावा पत्थरों , हाथी की मूर्तियों और 'पाल्म' के पेड़ों आदि पर हजारों करोड रुपए खर्च किए और इसमें भ्रष्टाचार की भी खबर है.

उनका कहना है कि लखनऊ पुलिस हाथी की मूर्तियां बनवाने में भ्रष्टाचार की जाँच कर रही है.

यादव ने संकेत दिया कि सरकार मायावती सरकार के कथित घोटालों की जाँच के लिए जल्दी ही रुपरेखा तय कर लेगी.

अनेक आरोप

स्थानीय अखबारों के मुताबिक ये खजूर के पेड़ मंहगे दामों पर खाड़ी के देशों से आयात किये गए.

Image caption पत्थरों के इन स्मारकों में शुरू में पेड़ न लगाने से हरियाली बिलकुल नहीं थी.

फिर इन पेड़ों की ढुलाई और लगाने पर बड़ी धनराशि खर्च की गयी.

खबरों के मुताबिक एक पेड़ पर 50 हजार रूपए तक का भुगतान किया गया और इस तरह 55 करोड़ रूपए के खजूर के पेड़ खरीदे गए.

बहरहाल सरकारी तौर पर इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नही कराई गई है कि खजूर के कुल कितने पेड़ खरीदे गए और उन पर कितना खर्च आया.

जियामऊ निवासी ज्ञान सिंह ने बताया कि स्मारक बनाने वाले कर्मचारी ये सूखे खजूर के पेड़ ट्रक या ट्राली में भरकर यहाँ छोड़ जाते थे.

ऐसा लगता है कि खजूर के इन सूखे पेड़ों को जलाकर सबूत मिटाने का भी प्रयास किया गया.

पत्थरों के इन स्मारकों में शुरू में पेड़ न लगाने से हरियाली बिलकुल नहीं थी.

इस बात की आलोचना होने के बाद आनन-फानन में बाहर से खजूर के पेड़ मंगाकर पत्थरों और कंक्रीट के बीच लगा दिए गए.

पर्याप्त मिटटी और पानी न मिलने से अधिकाँश खजूर के पेड़ सूख गए.

अधिकारी सूखे खजूर के पेड़ों की जगह नए पेड़ लगा देते थे. लेकिन दो महीने पहले मायावती के सत्ता से हटने के बाद नए पेड़ नही लगे इसलिए सूखे पेड़ खड़े हैं.

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