ढलान पर लुढ़कते शाहरुख खान?

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Image caption पिछले कुछ दिनों से शाहरुख खान गलत वजहों से सुर्खियों में हैं

शाहरुख खान सुर्खियों में हैं. वैसे तो वो पिछले दो दशकों से सुर्खियों में बने रहे हैं.

इस बार की वजह थोड़ी अलग है. उन्होंने कथित तौर पर वानखेड़े स्टेडियम में अभद्र व्यवहार किया है और मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (एमसीए) से उनकी ठन गई है. हालाँकि गालियाँ देने की बात स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा है पहले स्टेडियम अधिकारियों ने उनके साथ गए बच्चों से बदतमीजी की थी.

थोड़े दिन पहले ऐसे ही एक वजह से वो सुर्खियों में थे. तब उन्होंने अपनी पुरानी मित्र फराह ख़ान के पति शिरीष कुंदर की पिटाई कर दी थी.

उससे और पहले एक बार उनकी सलमान खान से लड़ाई हो गई थी.

और उससे पहले पूरी फिल्म इंडस्ट्री बोलती थी कि दो ही चीजें बिकती हैं, एक सेक्स और दूसरा एसआरके यानी शाहरुख खान. यह बात दूसरे बोलते थे. शाहरुख खान को इस पर यकीन हो गया. समस्या की जड़ें इसी यकीन में हैं.

इतिहास गवाह है कि शीर्ष पर आज तक कोई स्थाई रूप से नहीं रह पाया. चाहे वो रोमन साम्राज्य हो या फिर मुग़ल साम्राज्य. वो चाहे सिकंदर हो या फिर अमिताभ बच्चन. ऐसे में शाहरुख़ ख़ान भला अपवाद कैसे हो सकते हैं. और क्यों हो सकते हैं भला?

हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में एक कल्पित शीर्ष है. इसे 'सुपर स्टार' का नाम दिया गया है. कहते हैं कि राजेश खन्ना हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार थे. फिर अमिताभ आए और उन्होंने राजेश खन्ना को पदच्युत कर दिया.

जब अमिताभ बच्चन की शंहशाही का पतन हो गया तब काफ़ी दिनों तक एक रिक्तता रही. फिर शाहरुख खान आए. फिल्म इंडस्ट्री ने अपने चिर-परिचित चाटुकार अंदाज में शाहरुख को बादशाह की पदवी दे दी. वे बादशाह खान कहलाने लगे.

ऊँचाई और ढलान

लेकिन पहाड़ समतल नहीं होता. जिस ओर से आप पहाड़ पर चढ़ते हैं, उसके दूसरी ओर ढलान होती है.

पहाड़ पर चढ़ने उतरने का एक पूरा दर्शन है. इस दर्शन के जानकार एक आदरणीय मित्र कहते हैं कि जब आप ऊपर चढ़ रहे हों तो रास्ते में बहुत से लोग दिखते हैं जो शीर्ष पर पहुँचकर (या बिना पहुँचे भी) नीचे उतर रहे होते हैं.

वे कहते हैं कि बहुत बार ऊपर चढ़ रहा व्यक्ति नीचे उतर रहे लोगों को अनदेखा कर देता है. एक, क्योंकि वह अपनी पूरी शक्ति ऊपर पहुँचने में लगाना चाहता है, दूसरा, उसे नीचे उतर रहे लोग पराजित योद्धा की तरह लगते हैं, जिससे वह अपने आपको जोड़ना नहीं चाहता.

पहाड़ के शीर्ष पर पहुँच कर लगता है कि पूरी दुनिया आपके नीचे है. एक मिथ्याभिमान होने लगता है. लेकिन शीर्ष पर कितनी देर रहेंगे यह निर्भर करता है आपके पास मौजूद ऑक्सीजन के स्टॉक पर.

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Image caption शाहरुख खान आईपीएल की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक हैं

कितनी ऑक्सीजन आपके फेफड़े में है और कितनी आप सिलेंडरों में भरकर चल रहे हैं. ये ऑक्सीजन यथार्थ में आपकी काबिलियत, आपकी क्षमता, आपकी रणनीति और आपके मित्रों की मेहरबानियों पर निर्भर करती है.

फिर एक दिन आपको पहाड़ से उतरना होता है. ढलान ख़तरनाक होती है. अगर आप सचेत न रहे तो नीचे आने की गति बढ़ जाती है, फिर आप लुढ़कने लगते हैं. अनियंत्रित.

अच्छा ये होता है कि आप अपने हर कदम पर काबू रखें और शालीनता से नीचे उतर जाएँ. बिना ये फिक्र किए कि ऊपर चढ़ रहे लोग आपको तवज्जो दे रहे हैं या नहीं.

राजेश खन्ना ने इस शालीनता का खूब परिचय दिया. याद नहीं आता कि उनका कोई कदम लड़खड़ाया हो. नीचे आते हुए उन्होंने राजनीति की शाख भी थामी लेकिन उससे भी धीरे से किनारा कर लिया.

लेकिन अमिताभ बच्चन राजेश खन्ना की तरह शालीन नहीं रह सके. अपने फिल्मी करियर के शीर्ष में वो इलाहाबाद चले गए राजनीति करने. सड़कों पर बिछे लड़कियों के दुपट्टों पर चलकर उड़ने लगे. लेकिन राजनीति ने उन्हें करारी पटखनी दी.

बोफ़ोर्स का जो भूत उनके कंधे पर तब लदा तो अब जाकर उतरा, जब वे अपने करियर की आखिरी पारी खेल रहे हैं. उन्होंने लौटने की कोशिश की लेकिन उनके हाथ 'इंकलाब', 'मर्द' और 'गंगा जमना सरस्वती' जैसी बेसिर पैर फिल्में ही लगीं.

ये और बात है कि बाद में उन्होंने अपेक्षाकृत निचली पहाड़ी को अपना ठौर बनाया और वहाँ एक तरह से स्थाई निवास कर लिया.

लेकिन शाहरुख़ खान पहाड़ चढ़ने के इस दर्शन को नहीं समझ सके. जब वे इस बात पर यकीन कर रहे थे कि सिर्फ सेक्स और एसआरके बिकता है, आमिर खान ने जमीन पर तारे बेच कर दिखाया तो राजकुमार हीरानी और विधु विनोद चोपड़ा ने पहले मुन्ना भाई का भोलापन बेचा और फिर तीन मूर्खों (थ्री इडियट्स) के सहारे पहाड़ के शीर्ष के दरवाजा खटखटाया.

इस बीच हिंदी सिनेमा ने अपना एक नया व्याकरण भी रचना शुरु कर दिया. ऐसा नहीं है कि शाहरुख इससे अनभिज्ञ थे. 'माया मेमसाहब' में केतन मेहता के साथ काम करने के बाद तो कम से कम उन्हें पता ही चल गया होगा कि खब्ती फिल्मकार कैसा होता है.

ऐसे दौर में जब शाहरुख खान शीर्ष पर गाड़े अपने झंडे तले मगन थे, अनुराग कश्यप और दिबाकर बनर्जी तक कई फिल्मकार हिंदी सिनेमा में एक नई परिपाटी पर काम कर रहे थे.

पहाड़ के दर्शन में एक बात और अहम होती है, उम्र. शाहरुख खान इस सच्चाई को भी नकारने में लगे रहे. वे भूल गए कि 'ओम शांति ओम' का 'सिक्स पैक' उन्हें चाहे जो दे दे अतिरिक्त ऑक्सीजन नहीं दे सकता.

जैसे राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने अपने ढलान के दिनों में राजनीति की शाख थामी थी, शाहरुख ने आईपीएल के जरिए क्रिकेट का बल्ला थामा. लेकिन अब वही उनके लिए जी का जंजाल बन गया दिखता है.

शाहरुख खान नाम का ब्रांड एक समय इतना लोकप्रिय था कि मीडिया को उसके खिलाफ कुछ कहते-लिखते डर होता था कि कहीं पिट न जाएँ. लेकिन पिछले दो वर्षों में ऐसा करना गुस्ताखी नहीं रह गई है.

मीडिया में पिछले दिनों जिस तरह से शाहरुख खान, उनकी पत्नी गौरी और उनकी सह-अभिनेत्री प्रियंका को लेकर चर्चाएँ हुई हैं, उन्होंने शाहरुख खान की छवि को आघात पहुँचाया है.

ब्रांड की ख़त्म होती वैल्यू

'रा-वन' की ऐतिहासिक विफलता ने इस मिथक को पूरी तरह से तोड़ दिया कि एसआरके कुछ भी बेच सकता है.

एक अखबार में प्रकाशित ताजा रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि अब बाजार को शाहरुख़ की क्षमता पर शक होने लगा है. ये रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ समय में कई बड़े ब्रांडों ने शाहरुख को अपने विज्ञापनों से अलग कर लिया है. इसी में कहा गया है कि शाहरुख खान की कीमत भले ही न घटी हो, लेकिन इसी समय में आमिर की कीमत दो गुनी हो गई है.

शाहरुख खान को यह भ्रम हो सकता है कि जिस शीर्ष पर वो थे वहाँ अभी कोई नहीं पहुँचा है. 'सुपर स्टार' की गद्दी अभी खाली है. लेकिन उन्हें यह समझने की जरुरत है कि वारिस न होने पर भी गद्दी तो उन्हें छोड़नी पड़ेगी. ठीक उसी तरह, जिस तरह अमिताभ ने छोड़ा था.

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Image caption रा-वन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा चल नहीं पाई

दुनिया देख रही है कि शाहरुख खान के पास ऑक्सीजन ख़त्म हो गया है. दुनिया देख रही है कि वो ढलान पर हैं.

लेकिन यह देखना किसी को अच्छा नहीं लग रहा है कि वे एक परिपक्व साधक की तरह एक-एक कदम जमाकर नीचे नहीं उतर पा रहे हैं. उन्होंने अपनी गति को नहीं साधा है और वे लुढ़कने की कगार पर हैं.

अपने प्रिय नायक को इस तरह से गर्त में जाता देखना किसे अच्छा लगेगा भला? मजबूरी है कि उन्हें उनके प्रशंसक जाकर थाम नहीं सकते लेकिन वे हमेशा उनके साथ रहेंगे.

राजेश खन्ना ने हाल ही में पहली बार विज्ञापन किया. एक पंखे के इस विज्ञापन में उनकी पंक्तियाँ एक सच को उजागर करती हैं.

अमिताभ बच्चन ने उनसे 'सुपर स्टार' की पदवी छीनी थी लेकिन वे उनके प्रशंसकों को नहीं छीन सके. 'आनंद' फ़िल्म में अमिताभ को बाबू मोशाय कहकर पुकारने वाले राजेश खन्ना इस विज्ञापन में कहते हैं, "बाबू मोशाय, मेरे फ़ैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता."

इस सच को शाहरुख खान जितनी जल्दी समझ लें, उनके लिए उतना ही अच्छा है.

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