कैसा रहा ममता के बंगाल का एक साल

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Image caption पिछले साल चुनाव में ऐतिहासिक जीत के बाद राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेतीं ममता बनर्जी

पिछले साल इसी दिन ममता बनर्जी 34 साल पुरानी कम्युनिस्ट सत्ता पर विराम लगाकर उस राज्य की सबसे शक्तिशाली कुर्सी पर काबिज हुई थीं जो अपने भारी कर्जे और अपनी बौद्धिकता के लिए जाना जाता था.

एक साल के इस समय में, क्या उनकी लोकप्रियता घटी है, या बढ़ी है, या जस की तस है – ये सवाल हर बंगाली के मन में उठ रहा है, चाहे वो पश्चिम बंगाल में रह रहा हो या बाहर.

वैसे तो इस बारे में कोई सर्वेक्षण दिखाई नहीं दिया, मगर राज्य के भीतर आम भावना ये दिखती है कि शहरी मध्यवर्ग मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता में कुछ कमी आई है, मगर ग्रामीण इलाकों में इसपर कोई फर्क नहीं पड़ा है.

आइए देखते हैं कि उन्होंने किन-किन बातों को अपनी सफलता बताया है, जिसको कि उनकी सरकार ने तमाम राष्ट्रीय अखबारों में छपाए अपने बड़े-बड़े विज्ञापनों में गिनाया है.

सफलता के 19 दावों में से कुछ ये हैं –

1. किसानों से जमीन नहीं ली जाएगी और जो नहीं देना चाहते उनकी जमीनें लौटाई जाएँगी.

2. माओवादियों के नियंत्रण वाले इलाकों में शांति लौटी, हिंसक घटनाओं में नाटकीय कमी.

3. दार्जीलिंग और उससे लगे इलाकों में त्रिपक्षीय समझौते के बाद शांति लौटी.

4. 176 कंपनियों से एक लाख करोड़ रूपए के निवेश के प्रस्ताव, खस्ताहाल स्वास्थ्य क्षेत्र को नवजीवन मिला.

5. औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार के तीन लाख से ज्यादा नए अवसर, दस हजार गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों को मान्यता मिलेगी, इमामों और मुअज्जिनों के लिए भत्ते.

मगर सामान्यतः अपने राजनीतिक आकाओं की आलोचना करनेवाले बंगाली लोगों को इन दावों पर मुश्किल से ही भरोसा हो रहा है, विशेष रूप से नई नौकरियों के बारे में और माओवादी इलाकों तथा दार्जीलिंग में स्थायी शांति के संबंध में.

वहीं मुस्लिम समुदाय में भी इस बात को लेकर कोई ऐसा उत्साह नहीं है कि ममता बनर्जी सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू कर देंगी, जिसका कि उन्होंने वादा किया था.

असल कामयाबी

पश्चिम बंगाल के पूर्व ग्रामीण विकास सचिव और प्रदेश के भूमि सुधारों की नीतियाँ बनानेवाले, और अब सांसद, देवब्रत बंदोपाध्याय की निगाहों में ममता बनर्जी की असल सफलताएँ ये हैं –

1. उन्होंने देश में मल्टी ब्रांड रिटेल सेक्टर को आने से रोककर सारे देश में साढ़े चार करोड़ छोटी दूकानें और गुमटियाँ चलानेवालों के रोजगार की रक्षा की.

2. जंगलमहल इलाके में पहली बार दो रूपए प्रति किलोग्राम की दर पर चावल दिया गया जिससे गरीबी में कमी आई और माओवादियों का प्रभाव घटा.

3.किसानों से जबरन जमीनें नहीं ली गईं.

देवब्रत बंदोपाध्याय कहते हैं,"रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश के विरोध से बंगाल और शेष भारत में उनके पास एक ठोस जनाधार बन गया है."

नाकामी

ममता बनर्जी के समर्थक और आलोचक दोनों मानते हैं कि वे शहरी उच्च और मध्य वर्ग का समर्थन हासिल करने में पूरी तरह से नाकाम रही हैं.

वे दूसरे मुख्यमंत्रियों से अलग, लगातार टीवी पर दिखती रहती हैं, और ऐसे बयान देती हैं जिनसे भारी हंगामा खड़ा हो जाता है.

इसका एक उदाहरण, एक टीवी चैनल पर हाल ही में हुआ वो कार्यक्रम है जिसमें वे एक छात्रा के एक प्रश्न का उत्तर देते-देते आग-बबूला हो उठीं, और कोलकाता के एक संभ्रांत समाज की उस छात्रा को माओवादी कह डाला, और कार्यक्रम के बीच में ही कैमरा छोड़कर चल दीं.

ममता बनर्जी ने इससे पहले एक महिला के साथ हुए कथित बलात्कार की घटना को राजनीतिक साजिश बताया, एक कार्टून बनानेवाले प्रोफेसर को बुरा-भला कहा और एक योग्य महिला पुलिस अफसर का, उसके काम करने के लिए ट्रांसफर कर दिया.

उनके इन रवैयों से शह लेकर, उनके मंत्रियों ने खुले आम लोगों से एक वैधानिक राजनीतिक दल, सीपीआई(एम), का सामाजिक बहिष्कार करने का आह्वान कर डाला.

अब इन घटनाओं से भले ही बंगाल में कम्युनिस्टों की ताकत ना बढ़ी हो, मगर ममता बनर्जी की छवि पर दाग जरूर लग गया है.

उनकी पार्टी के एक सहयोगी ने कहा,"बिना किसी कारण के प्रेस में बदनामी हो रही है."

उनके ऊपर एक दूसरा आरोप ये लगता है कि वे सत्ता के विकेंद्रीकरण में नाकाम रही हैं. इसलिए उनके सारे के सारे मंत्री या तो अपने मन से कोई फैसला लेने के योग्य नहीं या वे ऐसा करने से डरते हैं.

केंद्र के साथ संबंध

केंद्र के साथ ममता बनर्जी के संबंधों सबसे बुरे दौर में हैं. वैसे दोनों एक-दूसरे का साथ छोड़ने से मना करते हैं, मगर दोनों ही एक-दूसरे से नाराज हैं.

केंद्र ममता बनर्जी पर सुधारों की राह में बाधा डालने का आरोप लगाता है जिसमें रिटेल क्षेत्र में विदेशी निवेश का मुद्दा भी शामिल है.

पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दूबे ने बीबीसी से कहा,"सबसे बुरा धक्का शायद बांग्लादेश के साथ तीस्ता नदी समझौते का विरोध करने से लगा है. इससे पूर्वोत्तर भारत में अवसर खुलते, मगर ममता ने ऐसा नहीं होने दिया."

मगर वे इसके लिए कुछ हद तक केंद्र सरकार को भी उत्तरदायी मानते हैं.

उन्होंने कहा,"केंद्र ने ममता को गंभीरता से नहीं लिया और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को उन्हें समझाने के लिए भेज दिया, जबकि असल में उन्हें किसी वरिष्ठ मंत्री को भेजना चाहिए था."

मुचकुंद दुबे को लगता है कि यदि ये समझौता नहीं होता है तो पड़ोसी देशों के साथ भारत के रिश्तों को बनाने की दिशा में भारत को भारी नुकसान होगा.

दूसरी तरफ, ममता बनर्जी आरोप लगाती हैं कि केंद्र और कुछ वरिष्ठ मंत्री उनके लिए समस्याएँ खड़ी करते रहते हैं, विशेष रूप से प्रदेश को पिछले कर्जों के निपटारे के लिए विशेष वित्तीय पैकेज नहीं देकर.

ममता बनर्जी सभी कर्जों के ब्याजों की अदायगी पर तीन साल की रोक लगाए जाने की माँग कर रही हैं और उनका कहना है कि केंद्र अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता.

उन्होंने हाल ही में पत्रकारों से कहा,"मैं वहाँ भीख का कटोरा लेकर नहीं जा रही, हम विशेष पैकेज भी नहीं माँग रहे. ये उनका संकल्प और वादा है, उनको ये करना ही होगा. ये नई बात नहीं है. पहले पंजाब के साथ हो चुका है. क्या बंगाल राज्य नहीं? क्या बंगाल की समस्या सबकी समस्या नहीं?"

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