पदोन्नति में आरक्षण पर बंटे सरकारी मुलाजिम

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Image caption समाजवादी पार्टी ने पदोन्नति में आरक्षण समाप्त करने का वादा किया था

पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के अठारह लाख सरकारी कर्मचारी-अधिकारी दो खेमों में बंट गए हैं. दोनों वर्ग इस मसले पर संविधान संशोधन के पक्ष और विपक्ष में राजनीतिक दलों को समझाने में लगे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने अपने एक फैसले से उत्तर प्रदेश की सरकारी नौकरियों में दलित वर्ग के लिए पदोन्नति में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता के नियम को गैरकानूनी करार दिया था.

समाजवादी पार्टी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय को लागू करके पांच साल से रुकी पदोन्नति की प्रक्रिया को पुनः शुरू कर दिया है. लेकिन दलित वर्ग के लोग सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने के लिए संविधान संशोधन की मांग कर रहें हैं.

किसने क्या किया

वर्ष 1994 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की साझा सरकार ने एक कानून बनाकर सरकारी नौकरियों में में पदोन्नति में दलित वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू कर की थी.

बाद में वर्ष 2002 में बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की साझा सरकार ने एक कदम आगे जाते हुए दलित वर्ग के अधिकारी को और तेजी से पदोन्नति दिलाने के लिए परिणामी ज्येष्ठता भी प्रदान कर दी.

इस व्यवस्था से दलित वर्ग के अधिकारी अपने सीनियर को लांघते हुए पदोन्नति पाकर काफी ऊपर पहुँचने लगे.

वर्ष 2005 में मुलायम सरकार ने जूनियर को सीनियर बनाने वाले इस परिणामी ज्येष्ठता के नियम को रद्द कर दिया. मगर साल 2007 में मायावती ने दलित वर्ग को तेजी से प्रमोशन दिलाने के लिए फिर से परिणामी ज्येष्ठता का नियम लागू कर दिया.

हाईकोर्ट का आदेश

लेकिन गैर-दलित अधिकारियों की अपील पर हाईकोर्ट ने इसे स्थगित कर दिया. हाईकोर्ट के स्थगन से पदोन्नति की प्रक्रिया रुक गयी और इस समय उत्तर प्रदेश में पदोन्नति के एक लाख तीस हजार पद खाली हैं. मायावती सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी.

पिछले विधान सभा चुनाव में यह एक अहम मुद्दा था. समाजवादी पार्टी ने पदोन्नति में आरक्षण समाप्त करने का वादा किया था.

चुनाव के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल के अपने आदेश में कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के कानून में दलित वर्ग के लोगों को पदोन्नति में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता का प्रावधान अवैधानिक है. अदालत की राय में संविधान में आरक्षण की व्यवस्था नौकरी में भर्ती के लिए है न कि बाद में होने वाली पदोन्नति के लिए.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एम नागराज के मामले में अदालत के एक पुराने निर्णय का हवाला दिया है जिसमें कहा गया है कि केवल तीन परिस्थितियों में पदोन्नति में आरक्षण दिया जा सकता है. पहला यह कि सरकारी सेवा में दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व कम हो, दूसरा दलित वर्ग के अधिकारी पिछड़े हों और तीसरा इस पदोन्नति से संबंधित विभाग की कार्य-कुशलता पर प्रतिकूल असर न पड़े.

सरकार की फुर्ती

अखिलेश यादव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को तुरंत लागू कर दिया, जिससे हर विभाग में तेजी से पदोन्नति हो रही है.

अब दलित वर्ग के अधिकारी मांग कर रहें हैं कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने के लिए संविधान में संशोधन किया जाए.

अम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल कहते हैं, ''हम लोग तो पूरे प्रदेश में या यह कहिये कि पूरे देश में यह माहौल बनाने की कोशिश कर रहें हैं कि एक जन दबाव लोक सभा पर पड़े और लोक सभा संविधान संशोधन लाकर इस मामले को हल करे.''

लेकिन दूसरी ओर सर्वजन हिताय संरक्षण समिति के अध्यक्ष शैलेन्द्र दुबे का कहना है कि पदोन्नति में आरक्षण से गैर- दलित अधिकारी कुंठित होते हैं और सरकारी सेवाओं पर इसका उलटा असर पड़ता है. दुबे इसे मौलिक अधिकारों का हनन करार देते हैं.

वे कहते हैं, ''देश भर के तमाम सरकारी कर्मचारी और अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने की किसी भी कोशिश का विरोध करेंगे.''

उत्तर प्रदेश के अठारह लाख सरकारी कर्मचारी पदोन्नति में आरक्षण के इस विवाद में दलित और गैर दलित खेमों में बंट गए हैं. दोनों खेमे सभा-जुलूस और रैली करके राजनीतिक दलों को अपने-अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहें हैं.

बहुजन समाज पार्टी दलित वर्ग के साथ खड़ी है तो समाजवादी पार्टी गैर-दलित अधिकारियों के साथ है. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का रुख अभी साफ़ नही है.

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