शांति-निकेतन के जर्मन-दादा

Image caption बोपार्ड ने अपनी दूसरी पीएचडी विश्वभारती से की थी

रवींद्रनाथ टैगोर के शांति-निकेतन में स्थापित विश्वभारती विश्वविद्यालय में विदेशी छात्र अक्सर नजर आते हैं, लेकिन इससे सटे ग्रामीण इलाके में टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर किसी विदेशी को साइकिल चलाते या जगह-जगह रुककर स्थानीय लोगों से फर्राटेदार बांग्ला में बात करते देखकर आश्चर्य होना स्वाभाविक है.

मार्टिन कैंपचेन नामक इस 64 वर्षीय व्यक्ति को इलाके में जर्मन टैगोर या जर्मन दादा (दादा यानी बांग्ला में बड़े भाई का संबोधन) कहा जाता है.

रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़े कई पुरस्कारों के अलावा मार्टिन को जर्मन सरकार के आर्डर ऑफ मैरिट से सम्मानित किया जा चुका है. इसी साल उनको पहले मर्क-टैगोर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है.

उनके रंग को ध्यान में नहीं रखें तो वे स्थानीय लोगों की तरह ही लगते हैं. फर्राटे से बांग्ला बोलने वाले मार्टिन शांति-निकेतन से सटे दो आदिवासी-बहुल गांवों में विभिन्न विकास कार्यों में जुड़े हैं.

सांध्य-स्कूल की शुरुआत

उनकी सहायता से इलाके में एक सांध्य-स्कूल भी चलता है. वह कोई 25 साल से भी लंबे अरसे से इन इलाकों और वहां रहने वाले संथाल जनजाति के लोगों की बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं.

मार्टिन ने टैगोर की कविताओं के जर्मन अनुवाद के अलावा उन पर कई किताबें भी लिखी हैं. स्थानीय संथाल लोग मार्टिन को देखते ही उनको घेरकर अपनी समस्याओं के बारे में बताने लगते हैं.

घोषालडांगा और विष्णुबाटी गांवों के लोग उनको अपने समुदाय का ही सदस्य मानते हैं. उन्होंने इन दोनों गांवों में विकास कार्यों की देखरेख के लिए घोषालडांगा आदिवासी सेवा संघ की स्थापना कराई है.

इन परियोजनाओं के लिए वे विभिन्न जर्मन एजेंसियों के अलावा कोलकाता स्थित जर्मन वाणिज्य दूतावास से भी आर्थिक मदद लेते हैं.

गुरूदेव से प्रेरणा

Image caption जर्मन-दादा ने वर्ष 1986 में छह छात्रों के साथ एक सांध्य स्कूल खोला था

लेकिन आखिर मार्टिन इन गांव वालों से कैसे जुड़े? वे बताते हैं, ''रवींद्रनाथ के जीवन ने मुझे इसकी प्रेरणा दी. टैगोर का आदर्श है कि लोगों को किसी साझा लक्ष्य की प्राप्ति के लिए राष्ट्रीयता भुलाकर मिलकर काम करना चाहिए.''

जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर के पास बोपार्ड में जन्मे मार्टिन ने वर्ष 1973 में विएना से पीएचडी की थी. उससे दो साल पहले जर्मन सरकार के अनुदान पर वे तीन महीने के लिए भारत आए थे.

उस दौरान उन्होंने देश के कई शहरों का दौरा किया था.

वर्ष 1986 में मार्टिन ने विश्वभारती से भी पीएचडी की.

मार्टिन कहते हैं, ''मेरा बचपन एक फार्म-हाउस पर बीता था. कोलकाता और मद्रास में रहने के बाद मैं किसी बड़े शहर में नहीं रहना चाहता था. शांति-निकेतन में पीएचडी करने के दौरान ही स्थानीय संथाल लोगों से मेरा मेलजोल बढ़ा और मैंने उनकी बेहतरी के लिए काम करने का फैसला किया.''

लोगों की समस्याओं को गहराई से समझने के लिए उन्होंने बांग्ला भाषा सीखी.

'नेता बनना नहीं बनाना है'

घोषालडांगा के सोना मूर्मू कहते हैं, ''जर्मन दादा पहले बाउल संगीत सुनने के लिए गांव में आते थे. मेलजोल बढ़ने पर उन्होंने गांव में एक स्कूल खोलने की सलाह दी. उनकी सलाह पर ही वर्ष 1986 में छह छात्रों को लेकर एक सांध्य स्कूल खोला गया. आज इसमें 80 से ज्यादा छात्र-छात्राएं और 10 शिक्षक हैं.''

वे बताते हैं कि स्कूल के लिए हमारे पास पैसा नहीं था. मार्टिन ने ही ब्लैक-बोर्ड, चॉक, कॉपियों, पुस्तकों और लैम्प के लिए पैसे जुटाए.

सोना मूर्मू, मार्टिन के साथ जर्मन, ऑस्ट्रिया और बांग्लादेश का दौरा कर वहां विभिन्न उत्सवों में संथाल कला, नृत्य और संगीत की झलकियां पेश कर चुके हैं.

इस स्कूल में पढ़ने वाली बसंती मूर्मू कहती है, ''अगर यह स्कूल नहीं होता तो मैं साक्षर नहीं बन पाती. हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि घरवाले मुझे पढ़ने किसी स्कूल में भेजते.''

इस सांध्य-स्कूल की वजह से इन दोनों संथाल-बहुल गांवों में लोग साक्षर हो गए हैं.

मार्टिन की दिलचस्पी खुद नेता बनने में नहीं है.

वह लोगों को विकास के काम में अग्रणी बनाना चाहते हैं. वे कहते हैं, ''मैं नेता बनना नहीं बल्कि बनाना चाहता हूं. जब तक खुद संथाल तबके के लोग ही विकास कार्यों का जिम्मा लेने आगे नहीं आएंगे, तब तक इस तबके का विकास संभव नहीं है.''

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