भारत ने मानवाधिकार रिकॉर्ड का किया बचाव

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भारत ने जीनिवा में मानवाधिकार परिषद के सामने अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड का बचाव करते हुए कहा है कि देश में भले ही कुछ समस्याएँ हों लेकिन उसके पास इनसे सुधारने की भी क्षमता है.

भारत को 47 सदस्दीय संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के समक्ष सेना विशेषाधिकार क़ानून समेत कई सवालों पर सफाई देनी पड़ी.

अटॉर्नी जनरल जी वाहनवती ने जवाब देते हुए कहा कि विवादित सेना विशेषाधिकार क़ानून (एएफएसपीए) का सरकार लगातार रिव्यू कर रही है.

पीटीआई के मुताबिक उनका कहना था, “सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को संवैधानिक बताया है. कई तरह के चेक और बैलेंस वाले प्रावधान इसमें रखे गए हैं ताकि सुरक्षाबल जब चरमपंथियों और विद्रोहियों से निपटें तो इनका ध्यान रखें. अगर उल्लंघन होता है तो स्थिति से पारदर्शिता से निपटा जाता है. हम लगातार इस कानून की समीक्षा कर रहे हैं.”

हर चार साल में एक बार संयुक्त राष्ट्र के 192 सदस्यों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की समीक्षा होती है जिसे यूनिवर्सल पिरऑडिक रिव्यू कहा जाता है. पिछली बार ये समीक्षा 2008 में हुई थी.

सवाल जवाब

भारत की ओर से ये रिपोर्ट साल भर चली गहन बातचीत के बाद तैयार की जाती है. इसमें विभिन्न मंत्रालयों, विशेषज्ञों, नागरिक समाज और पत्रकारों से विचार विमर्श किया जाता है. नियामक आयोगों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को भी ध्यान में रखा जाता है.

अटॉर्नी जनरल वाहनवती ने परिषद के सामने लोकपाल और लोकायुक्त बिल के संसद में पेश किए जाने को बड़ी उपलब्धि बताया.

उन्होंने भारत के सामने चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा, “आतंकवाद और विद्रोही गतिविधियाँ हमारे लिए बड़ा खतरा है.”

भारत ने मानवाधिकारों के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियाँ गिनाते हुए कहा कि सूचना का अधिकार और मनरेगा जैसी योजनाएँ लागू की गई हैं.

जीनिवा में जब भारत की समीक्षा हुई तो कई देशों ने अपने अपने सवाल रखे. डेनमार्क ने मौत की सज़ा के प्रावधान पर स्पष्टिकरण माँगा तो चेक गणराज्य ने प्रताड़ना रोकने संबंधी बिल पर जानकारी माँगी.

जर्मनी ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर सवाल पूछा तो ब्रिटेन ने गिरते लिंग अनुपात, धर्म परिवर्तन और साम्प्रादियक हिंसा पर सवाल उठाए.

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