सैनिक भर्ती शिविर पंहुचे बस्तर के युवा

सैनिक शिविर
Image caption भर्ती शिविर में शामिल होने के लिए नौजवानों ने सुदूर इलाकों से लंबा सफर तय किया है.

काली अंधेरी रात के बाद सूर्य का अदय जीवन में नई उम्मीदों की किरण लेकर आता है. लेकिन छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में सूरज की किरणें भी वहां फैली खौफ की चादर को नहीं भेद पातीं. शायद इसलिए वहां के नौजवान भारतीय सेना के भर्ती शिविर में नई उम्मीदों को तलाश करने की कोशिश कर रहे हैं. बावजूद इसके कि इस शिविर पर नक्सलियों के फरमान का साया है.

बस्तर के कांकेर में आयोजित सेना के भरती शिविर में 300 रिक्त पदों के लिए 3,000 स्थानीय नौजवानों ने प्रतिवेदन दाखिल किए हैं.

गरमी शबाब पर है, और चयन प्रक्रिया बहुत जटिल, लेकिन 'मुश्किल जीवन से छुटकारे की राह' तलाश कर रहे युवा सुबह चार बजे आयोजित दौड़ के लिए पूरी तरह तैयार दिखे. इस दौड़ में अच्छा स्थान लाने पर ही उन्हें आगे की प्रक्रिया में हिस्सा लेने का मौका मिलेगा.

उम्मीद की किरण बना सैनिक भर्ती शिविर

दिन का तापमान 47 डिग्री के आसपास होने की वजह से दौड़ की प्रक्रिया तड़के ही आयोजित की जाती है. फिर बाकी के दिन में गर्म हवाओं के थपेड़ों के बीच दूसरी प्रक्रियाओं को अंजाम दिया जाता है.

कोंडागांव के एक नौजवान का कहना है कि मौसम कि तल्खी उतनी परेशानी करने वाली नहीं है जितनी मुश्किल उन्हें अपने इलाके में रहने में होती है क्योंकि यह पूरा का पूरा इलाका सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच चल रहे युद्ध का केंद्र है.

वो बताते हैं, "इस युद्ध नें स्थानीय लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है. यही सोचकर मुझे लगा कि सेना में भर्ती होना चाहिए."

शक की नजर

मेरी मजबूरी है कि मैं इस शिविर में मौजूद नौजवानों का नाम नहीं लिख सकता. सेना भर्ती बोर्ड के निदेशक कर्नल पंकज शर्मा कहते हैं कि अगर मैं इन नौजवानों का नाम लिखता हूँ तो यह अपने गांव वापस लौटकर चैन से नहीं रह सकेंगे.

कर्नल शर्मा मुझसे यह भी कहते हैं कि इन नौजवानों से मैं नक्सलवाद या माओवादियों के मुद्दे पर भी बात ना करूँ.

मगर मेरी जिज्ञासा मुझे इनके बीच खींच कर ले गई. कांकेर के घड़ी चौक के पास बनी दुकानों के बरामदे में लेटे हुए इन युवाओं से मैंने पूछा कि सुदूर अंचलों में नौजवानों की जिन्दगी कैसी है तो सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगे.

फिर उस समूह में से एक ने कहा, "क्या सुनना चाहेंगे? बस यह समझ लीजिये हम खुली हवा में सांस तक नहीं ले सकते हैं, सुदूर इलाकों में रहने का मतलब है हर कोई आपको शक की नजर से देखता है. अब दम घुटने लगा है. इसलिए यहां आए हैं भर्ती होने."

एक दूसरे नौजवान ने यहां के इलाकों से बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन के बारे में बताया. यह नौजवान बीजापुर के इलाके से आए थे.

उनका कहना है कि अपने और अपने परिवारजनों की सुरक्षा को देखते हुए गांव के गांव खाली कर लोग दूसरी जगहों पर जाकर बसने लगे हैं.

माओवादियों का फरमान

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब सेना बस्तर में अपना भर्ती शिविर लगा रही हो. मगर इस बार इस शिविर पर नक्सलियों के फरमान का साया है.

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दक्षिण रीजनल कमिटी नें पर्चे बांट कर बस्तर के नौजवानों से सेना में भर्ती नहीं होने का फरमान जारी किया है.

कमिटी के सचिव गणेश उईके के हस्ताक्षर से जारी इस बयान में माओवादियों ने नौजवानों से उनकी जनमुक्ति छापामार सेना में भर्ती होने का आह्वान किया है.

माओवादियों के इस फरमान का खासा असर दिखा क्योंकि दक्षिण बस्तर के सुदूर इलाकों से जैसे की सुकमा, नारायणपुर और बीजापुर से उतनी संख्या में नौजवान सेना के भर्ती शिविर में नहीं आ पाए जितनी की उम्मीद की जा रही थी.

सेना भरती बोर्ड के निदेशक कर्नल पंकज शर्मा नें बीबीसी को बताया कि इसके बावजूद इन इलाकों से नौजवानों का रुझान काफी साकारात्मक रहा है. उनका कहना था कि सेना की भी प्राथमिकता है कि रिक्त पदों पर बस्तर के सुदूर इलाकों के नौजवानों को तरजीह दी जाए.

सेना के लिए अनुकूल

बस्तर संभाग का दक्षिणी इलाका अमूमन कुपोषण और अभाव के लिए जाना जाता है. मैंने कर्नल शर्मा से पूछा कि दूसरे राज्यों, मसलन हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार की तुलना में यहां के नौजवान शारीरिक रूप से कहां खड़े होते हैं?

कर्नल शर्मा कहते कि इस जंगली इलाके की प्राकृतिक पृष्ठभूमि नें यहां के नौजवानों के अन्दर संघर्ष करने की स्वाभाविक प्रतिभा प्रदान की है.

वे कहते हैं, "यह जिन परिस्थितियों में रहते हैं वह सेना में भर्ती होने के लिए सबसे अनुकूल है. यह जंगलों में पेड़ों पर चढ़ते हैं. मीलों पैदल चलते हैं और जिंदा रहने के लिए परिस्थितियों के साथ संघर्ष करते हैं. यही सब कुछ तो फ़ौज में सिखाया जाता है."

शाम ढल रही थी और अगले दिन सुबह की तैयारियां भी शुरू हो चुकीं थीं. कल एक बार फिर सूरज निकलेगा और एक बार फिर नौजावनों का एक नया दल भर्ती की दौड़ में शामिल होगा!

कल का सूरज भी इनके लिए एक नई उम्मीद लेकर आएगा. जिन्दगी की इस दौड़ में हर किसी का लक्ष्य है सफल होना क्योंकि जो पीछे छूट जाएंगे उन्हें वापस उसी संघर्ष के बीच अपनी जिन्दगी को तलाश करने पर मजबूर होना पड़ेगा.

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