आरएसएस की नजर में सिर्फ मोदी विकल्प

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Image caption मंगलवार को नरेंदर मोदी की लोकप्रियता और उन पर भरोसे को उनके घर में एक बार फिर चुनौती दे दी गई

ऐसे में जब लाल कृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता का मानना है कि आम आदमी भारतीय जनता पार्टी से भी नाखुश है, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइजर में छपे लेख में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने की सलाह दी गई है.

वैसे आरएसएस की हिंदी पत्रिका पांचजन्य के ताजा अंक में मोदी की कार्यशैली पर सवाल उठाए गएं हैं.

ऑर्गनाइजर के ताजा अंक में 'राजनीतिक विश्लेषण' स्तंभ के तहत छपे लेख में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और भाजपा के चुनावी विश्लेषक जीवीएल नरसिंम्हा राव ने तर्क दिया है कि इस समय जनता यूपीए के शासन से त्रस्त है. ऐसे में देश में कांग्रेस विरोधी माहौल को देखते हुए भाजपा को किसी लोकप्रिय नेता को भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में पेश करना चाहिए.

राव ने लिखा कि जब-जब देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बना, किसी लोकप्रिय नेता ने इसे अपनी पार्टी के लिए केंद्र में सरकार के रूप में बदला.

लेखक ने अपने तर्क में 1989 में वीपी सिंह के बाद 1996,1998 और 1999 में अटल बिहारी वाजपेई की सरकारों का उदहारण दिया.

लेख में कहा गया है, ''मोदी भाजपा का ऐसा चेहरा हैं, जिनमें पार्टी की अपील और देश भर में उसके वोट आधार का विस्तार करने की वैसी क्षमता है जैसी अटल बिहारी वाजपेयी ने नब्बे के दशक में करके दिखाया था.''

इसके बाद राव ने लिखा कि इस समय मोदी ही देश में सबसे लोकप्रिय नेता हैं. इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए आम आदमी की राय के लिए मीडिया की ओर से किए गए सर्वे का हवाला दिया.

ऑर्गनाइजर का यह रुख काफी रोचक है क्योंकि आरएसएस की हिंदी पत्रिका पांचजन्य के ही ताजा अंक में बतौर प्रशासक मोदी की कार्यशैली पर सवाल उठाए गए हैं.

कार्यशैली पर सवाल

पांचजन्य में लेखक देवेंद्र स्वरूप ने लिखा है कि भाजपा की कार्यकारिणी में संजय जोशी की मौजूदगी को प्रतिष्ठा का विषय बना कर मोदी ने मीडिया को संघ और भाजपा के विरूद्घ प्रचार को मौका क्यों दिया?

देवेंद्र स्वरूप आगे लिखते हैं कि मोदी जैसे नेता की छवि ऐसी बने कि वो अपने निकट सहयोगियों के प्रति सहिष्णु नहीं है और उन्हें साथ लेकर नहीं चल सकते, तो भाजपा के विरोधियों को उनके खिलाफ बोलने का अवसर मिलता ही है.

उन्होंने गुजरात में केशुभाई पटेल व बाकी असंतुष्टों के विरोध का भी हवाला देते हुए लिखा है, “भाजपा के इतने पुराने कार्यकर्ताओं के सामूहिक मोर्चे को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. इससे नरेंद्र मोदी को भी अपनी कार्यशैली और संगठन क्षमता के बारे में पुनर्विचार करने की आवश्यकता प्रतीत होती है. ”

घर में फिर चुनौती

रोचक यह भी है कि मंगलवार को मोदी की लोकप्रियता और उन पर भरोसे को उनके घर में एक बार फिर चुनौती दे दी गई.

मोदी के विरोधी संजय जोशी के समर्थन में अहमदाबाद में पार्टी मुख्यालय पर बड़ा पोस्टर लगा दिया गया.

इसमें लिखा था, “बीजेपी की क्या मजबूरी है, नहीं चलेगी दादागिरी. एक नेता को खुश करे और दूसरे से इस्तीफा मांगे. क्या यही बीजेपी की नीति है.” पार्टी को इस पोस्टर को लेकर खासी शर्मिंदगी उठानी पड़ी है.

इसी तरह के पोस्टर दिल्ली में भी पार्टी दफ्तर के आस-पास देखे गए, हालाकि बाद में उन पोस्टरों को हटा लिए गए.

दिल्ली में इस बारे में पूछे जाने पर पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि पार्टी ने ऐसा कोई पोस्टर नहीं छपवाया है.

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